यह मेल मुझे मेरे पापा ने भेजा है। मैं अपने बचपन की यादों को सहेजते हुए यह बताना चाहुंगी कि चुकि मेरे पापा अभी टिसको के रिसर्च डिपार्टमेंट में डी.एम के पदभार को संभाले हुए है और एनर्जी कनसर्वेशन को लेकर हमेशा विचार मग्न रहते हैं. बचपन से वे हमे समझाते आ रहे हैं कि किस किस तरह से हमसब एनर्जी को बचाते हुए आने वाले जनरेशन को कुछ दे पाऐंगे अन्यथा हमारे हाथ अपने बच्चों को देने के लिए घर, पैसा, ऐशोआराम तो होगा पर दुषित पानी, जहरीली हवा, औऱ रासायनिक तत्वों से भरा खाद्य पदार्थ उन्हें देने के लिए हम बाध्य होंगे।
तो वे सारे लोग जो इस पोस्ट को पढ़े हों और हमारी इस कोशिश में सहयोग करने की इच्छा रखते हों तो अपना सुझाव जरुर दीजिए कि कैसे हम लोग सामानो को रिसाइकिलिंग कर, कुछ हद तक ग्लोबल वार्मिंग को बचा सकते हैं। और भी उपाय जो सहज ढंग से हम कर सकते हैं सिर्फ अपनी इच्छा शक्ति के दम पर।
आभार पुनीता
RESERVE CONSUMPTION
Buddha, one day, was in deep thought about the worldly activities and the ways of instilling goodness in human beings. One of his disciples approached him and said humbly "Oh my teacher! While you are so much concerned about the world and others, why don't you look in to the welfare and needs of your own disciples also?"
Buddha : "OK.. Tell me how I can help you"
Disciple : "Master! My attire is worn out and is beyond the decency to wear the same. Can I get a new one, please?"
Buddha found the robe indeed was in a bad condition and needed replacement. He asked the store keeper to give the disciple a new robe to wear on. The disciple thanked Buddha and retired to his room. A while later; he went to his disciple's place and asked him "Is your new attire comfortable? Do you need anything more?”
Disciple : "Thank you my Master. The attire is indeed very comfortable. I need nothing more"
Buddha : "Having got the new one, what did you do with your old attire?"
Disciple : "I am using it as my bed spread"
Buddha : "Then.. hope you have disposed off your old bed spread"
Disciple : " No.. no.. master. I am using my old bedspread as my window curtain"
Buddha : " What about your old Curtain?"
Disciple : "Being used to handle hot utensils in the kitchen"
Buddha : "Oh.. I see.. Can you tell me what did they do with the old cloth they used in Kitchen"
Disciple : "They are being used to wash the floor."
Buddha : " Then, the old rug being used to wash the floor...?"
Disciple: "Master, since they were torn off so much, we could not find any better use, but to use as a twig in the oil lamp, which is right now lit in your study room."
Buddha smiled in contentment and left for his room.
If not to this degree of utilization, can we at least attempt to find the best use of all our resources at home and in office? We need to handle wisely, all the resources earth has bestowed us with ….both natural and material so that they can be saved for the generations to come. Reserve Consumption !!!
आभार
पुनीता
गुरुवार, 23 अप्रैल 2009
गुरुवार, 9 अप्रैल 2009
आम तो खट्टे हैं, पर मन है उचाट

गर्मी के दिनों की शुरुआत हो रही है औऱ आम के पेड़ में लगे मंजर छोटे छोटे आम बन रहे होंगे। मैं उम्मीद कर रही हूं कि आम आधी इंच के हो गए होगे। आम का पेड़ औऱ उसमें लगे आम काफी आकर्षित करते हैं राहगीर को। मैं जब अपने स्कूल से वापस आया करती थी तो (जमशेदपूर की रहने वाली हूं) तो टीसी क्लॉनी के क्वाटर में एक कोने के घर पर आम का पेड़ लगा था और उसके छिलके लाल रंग के थे। स्कूल आते और जाते वक्त पेड़ को देखना नहीं भूलती औऱ मन ही मन सोचती कि उसमें रहने वाले आदमी कितने बड़े लोग होंगे।
पता नहीं उस घर से तो मुझे कोई दिखा कि नहीं पर आज भी वह पेड़ मुझे याद आता है।
जमशेदपुर टाटा स्टील द्नारा बनाया गया एक व्यवस्थित शहर है। जहां उसके कर्मचारी को घर भी रहने को दिया जाता है और सभी घर के बगान मे कोई ना कोई पेड़ हैं। सड़कों के दोनो ओर तो पेड़ों की कतार है। विदेशी पेड़ नहीं दिखते। खास देशी पेड़ अपने में जंगलीपन लिए उगता है। अधिकतर फलदार, छायादार पेड़ होते हैं। अजीब सी खूबसुरती दिखती है। जब आमने सामने क्वाटर पेड़ों की कतार और फिर चौड़ी सड़क हो तो।
स्कूल से आते जाते या कभी भी घर से निकलते थे तो सब के घर के आम का पेड़ ही दिखता था। और आपस के बातचीत में भी यह बात उठती थी कि फलाना के घर इसबार खूब मंजर लगा है, और फलाना के घर उससे कम। मंजर की याद आते ही याद आता हैं कि कैसे पहली बारिश में आम के मंजर को अपनी पहली परीक्षा देनी पड़ती थी। मौसम तो सुहाना हो जाता था पर रोड़ पूरे मंजर से भर जाता था। सुबह जमादार (सफाई कर्मी) की शामत आता होगी। सरवाइवल फॉर द फिटेस्ट वाली बात होती मंजरो में भी। फिर कुल मिलाकर हजार हजार मंजर में बमुशि्कल दस पोपले लगते थे।
आम के आकार का बढ़ना हम पेड़ से कम अपने सहेलियों द्वारा स्कूल में लाए जाने से ज्यादा जान जाते थे कि अब आम इतना बड़ा हो गया है।
स्कूल में जो सबसे बड़े आकार का आम लाती उसकी इज्जत थोड़ी बढ़ जाती थी। और सभी उसे ललचाई दृष्टि से देखते। पर वह किसी को कुछ नहीं देती। हमारा बचपन प्रेमचंद्र के बचपन की तरह नहीं था इसलिए गांव की बात तो पूरी तरह नहीं होती पर शहर और गांव के मिला जुला रुप से हमारा बचपन गुजरा है। इसलिए ना पूरी तरह गांव की हो पाई और ना ही शहर की उस आबादी की तरह जो अपने बारे में ही सिर्फ सोचते हैं।
और तो थोड़ी भटकन के बाद फिर से मैं अपने बचपन में आती हूं कि स्कूल में सबसे बडे आकार के आम लाने पर वह लड़की कितनी अपने को महान समझती थी जैसे कि पूरी जन्नत उसकी हो। घर में पापा कच्चे आम देख कर ही गुस्सा हो जाते थे। शायद ही कभी अचार खाए हों। इसलिए कच्चा आम की इच्छा बढ़ती ही जा रही थी।
भरी दोपहर जब घर पर सब सोते तो मैं अपने घर के छत मतलब क्वाटर का छत जो ग्रिल के सहारे से चढ़ती और आम के पेड़ के छांव में बैठ जाती।
हमारे बगल के क्वाटर में खोकन चाचा लोग रहते थे। बंगाली परिवार था और काफी लोग थे उस घर में इसलिए उनके आम के पेड़ की रखवाली करना कोई मुशि्कल बात नहीं थी पर मैं तो छत पर चढ़ कर आम तोड़ती पर फिर भी मेरी सहेलियों से मेरे आम का साइज कम ही रहता था। काफी गर्मी के बाद अगर बारिश हो गई तो आनंद की पराकाष्ठा होती मेरी। मैं मां से छुप कर आम चुनने निकलती। सब के घर के सामने नाली होता है वहां पर और वह बारिश के पानी के लिए ही बना होता है, औऱ सभी वक्त सुखा ही होता है जो हमारे चोर पुलिस खेलते वक्त छुपने की जगह हुआ करता था । बारिश के दिनों में पानी
भर जाता और कोई आम अगर उसमें जा गिरा होता तो बहुत अफसोस होता। मेरे घर से और कोई नही निकलता मेरी दीदी को तो मार पड़ती थी कि घर पर क्यों घुसी रहती हो आज वह स्कूल की प्रिंसिपल है औऱ मुझे मार पड़ती थी कि तुम इतने देर तक क्यों खेलती रहती हो। मुझे खेल में भीबहुत प्राइज मिलता था। बचपन में बिताए क्वाटर में बारह साल बिताने के बाद हमें जबरदस्ती बड़े क्वाटर में जाना पड़ा। हमारे इस क्वाटर में अमरुद तीन पेड़ थे। घर के सामने बगान में दो और पीछे आंगन में एक। एक पेड़ में काफी अमरुद लदा होता था और दुसरे में काफी कम पर बहुत टेस्टी। पीछे आंगन के पेड़ पर चढ़ना संभव था इसलिए मैं अपना काफी समय उसपर गुजारती थी। मुझे तो हर एक आमरुद का पता होता कि हरदिन वह कितना बढ़ रहा है। मैं तो कई बार मुंह से काट कर डाल पर ही लटके रहने देती कि इसे तीन या चार दिन बाद तोड़ा जा सकता है।
यह सारी बात लिखने की इच्छा इसलिए बलवत हुई कि मैं संडे मार्केट में कच्चा आम देखी। बहुत महंगे थे फिर भी मैने खरीदा क्योंकि उसका साइज मेरे बचपन के दिनों की याद से बहुत बड़ा था। मैं आज भी अपने उन सहेलियों के लाये गए बड़े साइज के आम से अपने को कम मानती हूं कि मेरे पास वह नहीं है। और शायद इसलिए मैं हर गर्मी के मौसम में सबसे पहले कच्चे आम खरीदती हूं। अब मुझे खाने की बहुत इच्छा नहीं होती उस वक्त भी नहीं होती थी पर एक जिद।
मंगलवार, 7 अप्रैल 2009
हमारा बचपन
मैं और मेरे पति अक्सर फुरसत के पलों में अपने बचपन की घटनाओं को याद करते कभी रोमांच से सिहर जाते हैं, तो कभी रुआंसा। मैने अपने से इतर भी कई बार महसुस किया है कि लोग अपनी बचपन की घटना सुनाते वक्त कितने उत्साहित हो जाते है अगर कुछ दुखद घटा हो तो थोड़ी देर के लिए दुखित भी हो जाते हैं. मतलब कि हम सब अपने बचपन को अपने यादों की एलबम में सजोए, दिल से लगाए रहते हैं. फुरसत में यादों के पलों को सांझा करने के रोमांच में कई बार घटनाओं को इतने बढ़ा चढा कर बोलते हैं कि सुनने वाला भी अपने हिसाब से ही उस घटना को रिसीव करता है. फेंकी हुई बातें खुद ही छांट लेता है. पर किस्से सुनने- सुनाने में मजेदार होते है। बस इसी आइडिया को लेकर लेकर हमारा बचपन नामक यह बच्चा ब्लाग आपके सामने हाजिर है। जो हर वक्त आपके सामने बच्चा ही रहेगा। ।
गुरुवार, 2 अप्रैल 2009
बदलती लड़कियां
समय बदला और समय की मांग बदल रही है। आज का पवित्र दिन उन कन्याओं के नाम होता जा रहा है और उनके भाव बढ़ते चले जा रहे हैं। मेरे बचपन में ऐसा कुछ भी नहीं होता था। कन्या पूजा को याद करुं तो मुझे एक बार की गई पूजा याद आती है। पता नहीं मैं कितने साल की थी पर एक मेम साहब जैसे परिवार में हमलोगों को निमंत्रण मिला। हमसारे बच्चे उनके घर पधारे। अभी मुझे याद नहीं आता वह अंकल कहां काम करते थे पर उनके घर में बहुत सारे अच्छे अच्छे सामान थे। पहली बार सफेद सोफे पर बैठी थी तो ऐसा लगा था मानो हमलोगो अंदर ही घुस गए हैं। गेंद ढुंढते हुए मुझे याद हैं जब पलंग के नीचे झांकी थी तो बड़े बड़े लेदर के बक्शे थे जो बाद में पापा के फोरन ट्रिप से हमारे घर में भी आ गए थे। वह आंटी भी बहुत सुंदर याद नहीं पर लम्बी सी औऱ गोरी सी थी। इस सारे यादों के बीच में मुझे याद आता है कि कंजके का चलन उस वक्त इतना नहीं था और मुझे वापसी में एक रुपये के सिक्के मिले थे। बहुत आश्चर्यजनक घटना थी उन दिनों हमारे लिए। पर मैं तो एक औरत के मेरे पांव पूजने से तर गई थी। औऱ मुझे पूरे जीवन उस घटना की झलक याद है। औऱ यह भी याद है कि वह हमलोग को दोपहर के वक्त ही बुलाई थी। पर उनके घर के सामान देख कर पिक्चर में देखे गए सामान याद आ जाते थे। मेरे रोड़ में ही रहती थी। इसलिए जब भी उनके घर के सामने से गुजरना होता तो उनके घर के तरफ देखते हुए जाती मानो कोई अनोखा दृश्य दिख जाए।
आज समय बदल गया है। कल मेरी पड़ोसन ने जब श्रुति से कहा कि बेटा सुबह आठ बजे आ जाना तो उसका जवाब था - आंटी किसी को भेज देना। मुझे यह जवाब सुनकर तृप्ति मिली इसलिए कि वह अपनी अहमियत जानती-समझती है। अच्छी बात है।
सुबह से ही घूम रही है पर वहीं जहाँ उसे बुलाया जाता है। अब घर पर आ कर दक्षिणा में मिले पैसे की गिनती कर रही है। कुल 25 रुपये हो गए हैं। मेरे समय से बहुत ज्यादा है। मै ऐसे ही तुलना कर रही हूं। मजा आ रहा है उसकी सारी हरकतों के देखकर। पैसे लेना और फिर उसकी खर्च करने के प्लान यह सब दिलचस्प हैं। आज की कन्या भीरु नहीं है वह जानती है उसे क्या करना हैं। मुझे याद है जब वह छोटी थी तो मेरे बिना कहीं किसी के घर कन्या पूजा को नहीं जाती थी। पर अब मुझे उसे रोकना पड़ता है तो लोग घर से उठा कर ले जाते हैं। मुझे उसके द्वारा लाया गया प्रसाद अच्छा नहीं लगता। मैं उसे वहीं खा लेने को कहती हूं । पर वह नहीं मानती ले कर ही आती है।
बदलते समय में बदलती लड़कियों के तेवर देख मुझे अच्छा लगता है। आज के दिन कन्या की पूजा कर समाज अपने के शायद यह दिलासा देता है कि मेरे घर चाहे लड़की ना हो पर हम अड़ोस पड़ोस की लड़कियों की खूब इज्जत करते हैं। हम उन्हें पूजते हैं। हम उन्हें शकि्त का दर्जा देते हैं।
पर ऐसा नहीं है। यह आंकड़े ही बता सकते हैं कि लड़कियां अपने आस पड़ोस में ही कितनी सुरक्षित है। घर में उनकी कितनी इज्जत है। क्या वह लड़के की बराबरी आज भी कर रही है शायद एक ही स्कूल में बेटे औऱ बेटियों को पढ़ाने के बावजूद एक मां बाप की कसक मन में रह जाती है कि कन्या समाज में शकि्त हो सकती है, दुर्गा हो सकती है, सरस्वती भी हो सकती है पर घर में वह सिर्फ और सिर्फ ऐसी लड़की है जो परायी धन है उसे कुछ दिन ही इस घर रहना है और फिर अपने घर चले जाना है।
आज समय बदल गया है। कल मेरी पड़ोसन ने जब श्रुति से कहा कि बेटा सुबह आठ बजे आ जाना तो उसका जवाब था - आंटी किसी को भेज देना। मुझे यह जवाब सुनकर तृप्ति मिली इसलिए कि वह अपनी अहमियत जानती-समझती है। अच्छी बात है।
सुबह से ही घूम रही है पर वहीं जहाँ उसे बुलाया जाता है। अब घर पर आ कर दक्षिणा में मिले पैसे की गिनती कर रही है। कुल 25 रुपये हो गए हैं। मेरे समय से बहुत ज्यादा है। मै ऐसे ही तुलना कर रही हूं। मजा आ रहा है उसकी सारी हरकतों के देखकर। पैसे लेना और फिर उसकी खर्च करने के प्लान यह सब दिलचस्प हैं। आज की कन्या भीरु नहीं है वह जानती है उसे क्या करना हैं। मुझे याद है जब वह छोटी थी तो मेरे बिना कहीं किसी के घर कन्या पूजा को नहीं जाती थी। पर अब मुझे उसे रोकना पड़ता है तो लोग घर से उठा कर ले जाते हैं। मुझे उसके द्वारा लाया गया प्रसाद अच्छा नहीं लगता। मैं उसे वहीं खा लेने को कहती हूं । पर वह नहीं मानती ले कर ही आती है।
बदलते समय में बदलती लड़कियों के तेवर देख मुझे अच्छा लगता है। आज के दिन कन्या की पूजा कर समाज अपने के शायद यह दिलासा देता है कि मेरे घर चाहे लड़की ना हो पर हम अड़ोस पड़ोस की लड़कियों की खूब इज्जत करते हैं। हम उन्हें पूजते हैं। हम उन्हें शकि्त का दर्जा देते हैं।
पर ऐसा नहीं है। यह आंकड़े ही बता सकते हैं कि लड़कियां अपने आस पड़ोस में ही कितनी सुरक्षित है। घर में उनकी कितनी इज्जत है। क्या वह लड़के की बराबरी आज भी कर रही है शायद एक ही स्कूल में बेटे औऱ बेटियों को पढ़ाने के बावजूद एक मां बाप की कसक मन में रह जाती है कि कन्या समाज में शकि्त हो सकती है, दुर्गा हो सकती है, सरस्वती भी हो सकती है पर घर में वह सिर्फ और सिर्फ ऐसी लड़की है जो परायी धन है उसे कुछ दिन ही इस घर रहना है और फिर अपने घर चले जाना है।
मंगलवार, 31 मार्च 2009
लम्हें
लम्हें
जिन लम्हों में, राजहंस आकांक्षाओं के
मनसागर में, पंख खोले इठलाते हैं
लहराते हैं, तिर जाते हैं कितनी दूर तलक।
जिन लम्हों में भीषण पर्वत को
तोड़-तोड़ धाराएँ, कि जाने किस ख्याल से
होकर, बेखौफ, चली आती हैं
मदमाती हैं बढ़ जाती हैं
छल छल करके।
जिन लम्हों में, भीतर हरहराने पर
जब्त हुए शब्दों को भी
कह देते स्पर्शोन्मुख अधराधर
चुपचाप पढ़ा करते हैं सिहरन की
भाषा को औऱ मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
जिन लम्हों में काया की दीवारें
अंतर की मधुर वेदना में
अपने को खोकर हर्षाती
और सिमट-सिहर ढह जाती हैं।
जिन लम्हों में, भंवरे कलियों की परत-परत
को खोल-खोल बेसुध सौरभ से सने हुए
आते है, जाते हैं
औऱ बार-बार मुस्काते हैं, गाते हैं।
जिन लम्हों में, कोयल, चातक, चकोर
अपने प्रियतम को टेर टेर थक जाते हैं
फिर भी युग युग से प्रीति निभाए जाते हैं
उन दिव्य अलौकिक और चिरन्तन लम्हों को मेरा प्रणाम
जिनके रहस्यमय मादक, मोहक उदभावन को
कोई भी नहीं समझ पाया, लगता है ये चिर-परिचित हैं
लगता है नितान्त
अपरिचित हैं।
हमारा बचपन नाम का ब्लॉग बनाकर मन ने चाहा था कि मैं बचपन के लम्हों को बार बार जीयूं. और इसलिए ही मैं प्रयास रत्न हूं। बचपन की डायरी को पलट रही थी और मुझे एक कविता दिखी जो मुझे उस समय बहुत पसंद आती थी। कविता का भाव पता नहीं मैं उस समय समझ भी पाती थी कि नहीं पर मुझे यह कविता अच्छी जरुर लगती थी। लेखक से मैं अपरिचित हूं क्योंकि यह कविता मेरी फुफेरी बहन ने मेरी डायरी में लिखी थी। शायद यह उसकी ही लिखी कविता हो।
जिन लम्हों में, राजहंस आकांक्षाओं के
मनसागर में, पंख खोले इठलाते हैं
लहराते हैं, तिर जाते हैं कितनी दूर तलक।
जिन लम्हों में भीषण पर्वत को
तोड़-तोड़ धाराएँ, कि जाने किस ख्याल से
होकर, बेखौफ, चली आती हैं
मदमाती हैं बढ़ जाती हैं
छल छल करके।
जिन लम्हों में, भीतर हरहराने पर
जब्त हुए शब्दों को भी
कह देते स्पर्शोन्मुख अधराधर
चुपचाप पढ़ा करते हैं सिहरन की
भाषा को औऱ मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
जिन लम्हों में काया की दीवारें
अंतर की मधुर वेदना में
अपने को खोकर हर्षाती
और सिमट-सिहर ढह जाती हैं।
जिन लम्हों में, भंवरे कलियों की परत-परत
को खोल-खोल बेसुध सौरभ से सने हुए
आते है, जाते हैं
औऱ बार-बार मुस्काते हैं, गाते हैं।
जिन लम्हों में, कोयल, चातक, चकोर
अपने प्रियतम को टेर टेर थक जाते हैं
फिर भी युग युग से प्रीति निभाए जाते हैं
उन दिव्य अलौकिक और चिरन्तन लम्हों को मेरा प्रणाम
जिनके रहस्यमय मादक, मोहक उदभावन को
कोई भी नहीं समझ पाया, लगता है ये चिर-परिचित हैं
लगता है नितान्त
अपरिचित हैं।
हमारा बचपन नाम का ब्लॉग बनाकर मन ने चाहा था कि मैं बचपन के लम्हों को बार बार जीयूं. और इसलिए ही मैं प्रयास रत्न हूं। बचपन की डायरी को पलट रही थी और मुझे एक कविता दिखी जो मुझे उस समय बहुत पसंद आती थी। कविता का भाव पता नहीं मैं उस समय समझ भी पाती थी कि नहीं पर मुझे यह कविता अच्छी जरुर लगती थी। लेखक से मैं अपरिचित हूं क्योंकि यह कविता मेरी फुफेरी बहन ने मेरी डायरी में लिखी थी। शायद यह उसकी ही लिखी कविता हो।
शुक्रवार, 20 मार्च 2009
मिठी और डॉक्टर
सुबह मेरी मिठी की तबियत बहुत खराब हो चुकी थी। अब उसे दस्त भी होने लगा था। पिछले दो दिन से उसे बुखार हो रहा था। पता नहीं चल पा रहा था कि उसे बुखार क्यों हो रहा है। खांसी तो थी पर ज्यादा नहीं थी। सांस लेने में उसकी छाती से आवाज आती थी। सोच रही थी कोई बात नहीं ठीक हो जाएगी यूं ही। और इसलिए मैंने उसे डॉक्टर को दिखाए बिना बुखार की दवा देती रही। अब मैं सोच रही हूं मैने ऐसा क्यों किया पहले ही डॉक्टर को क्यों नहीं दिखा लाई। तीन दिनों तक सोचती रही थी कि फालतु में सौ रुपय डॉक्टर को होम हो जाऐंगे और मेरी मिठी को एंटीबॉयटिक खाना पड़ जाएगा। दोनों ही स्थिति मेरे मन मुताबिक नहीं थी। इसलिए मैं अपना इलाज चलाने लगी। पति रोज कह कर जाते डॉक्टर को जरुर दिखवा लेना। पर मैं नहीं गई। बहाना बना दिया ताकि मेरे सौ रुपय बच जाएं औऱ मिठी एंटिबॉयटिक ना पीये।
दरअसल मिठी की तबियत खराब होने में कसूर ही मेरा है। उसे मैने जमकर ठंडे अंगूर खिला दिया था जो खराबी कर गया।
सोमवार की सुबह उसकी पहली दस्त देख कर मैं डॉक्टर के पास जाने का मन बना ली थी। और तैयार होते ही पंद्रह मिनट में एक और दस्त। घबड़ा गई। उसके चेहरे की हंसी गायब थी औऱ वह सुस्त पड़ रही थी। घर में अब कोई सवारी न होने के कारण मैं अपने पति के साथ ही पांव पैदल निकल गई। रिक्शेवाले को ढुंढा पर वह दस मिनट बाद ही आता और अब मैं उसका इंतजार नहीं कर सकती थी, मैं चल दी। डॉक्टर का पता पूछने मैं जैन मंदिर के अंदर घुस गई। वहां अंकल से पता पूछा और आग्रह के स्वर में बोला, क्या डॉक्टर साहब सौ रुपय से कम नहीं लेते। अंकल ने बड़ी अच्छी कही कि तुम कहना मैं जैन मंदिर से आई हूं पैसे थोड़ा कम ले लो। उन्होने कहा कि डॉक्टर आदमी के चेहरे देखकर पैसे की चपत मारते है। कुछ कर नहीं सकती थी इसलिए सड़क की लंबी चक्कर काटकर डॉक्टर के घर पहुंच गई। वहां पहले से एक मार्डन मां अपनी बिटिया का इलाज करवा रही थी। ड़ॉक्टर ने उसे बच्चे के सांस लेने में हो रही तकलीफ को कम करने के लिए एक मशीन में दवा डाल उसे उसका भाप देने का प्रयास करने लगा। और बच्ची थी कि लगातार रोई जा रही थी औऱ मुझे यह सब देखकर कोफ्त हो रही थी कि यह डॉक्टर अपने बिल को बढ़ाने के लिए इतना छल प्रपंच कर रहा है। बाद में डॉक्टर ने उसके सौ रुपय देने पर पचास रुपय वापस कर दिए। मुझे राहत हुई औऱ मैं खुश हो गई कि शायद घर पर दिखाने का फीस पचास रुपय हो और मार्केट वाली क्लीनिक का फीस 100 रुपय लेते होंगे। अब मेरी बारी आई, और मैं यह बताने की उन्हें कोशिश करती रही कि यह सारा दोष फ्रिज में रखे ठंडे अंगूर ज्यादा खिला ने से हुआ है। डॉक्टर ने उसे अच्छे से देखा, दवा लिखी और खाने का तरीका बता दिया। अब पैसे देने की बारी आई, मैने सौ रुपय का नोट उनके सामने रख दिया और पचास रुपय लौटने का इंतजार करने लगी पर डॉक्टर सौ रुपय ड्रावर में डाल उसे बंद कर चुके थे। मैं समझ गई पर धीरे से कहा सौ रुपय हैं फीस क्या और उन्होने लम्बी सी मुस्कान दे हल्का सा सर हिला दिया। औऱ भी पेर्शोंट थे और मैं बिना उनसे कुछ कहे वापस आ गई। सोचा चलो कोई बात नहीं मैने रिक्शे के तो 15 रुपय बचा ही लिए ना। मैं घर लौट चली आई रास्ते भर सोचती आई कि सौ रुपय बचाने के चक्कर में मैने बेकार अपना दिमाग लगाया औऱ डॉक्टर जमात को कोसने लगी कि यह पांच मिनट देखते हैं और बेफीजूल उसके सौ रुपय ले लेते हैं। डॉक्टर की दवा खाकर मिठी को आराम हुआ और वह सो गई अब वह अच्छा महसूस कर रही है।
और मैं अब यह सोच रहीं हूं कि मैं डॉक्टर को उनके फीस से ज्यादा कुछ नहीं दे पायी, पर उन्हें दुआ हमें जरुर देनी चाहिए।
और इसके लिए तो डॉक्टर ने तो मात्र सौ रुपय ही लिए। डॉक्टर जो कठिन मेहनत कर अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं,क्या उन्हें अपने बचपन में ज्यादा खेलने का मन नहीं करता होगा, क्या वह अधिक शैतानी करना नहीं चाहते होंगें, क्या उनका मन औरों को मस्ती कर देख बावला नहीं होता होगा। पर वह अपने मन को काबू में कर सिर्फ पढ़ाई करते हैं, मन को यह समझाते हैं कि मस्ती तो बाद में भी की जा सकती है पर पढ़ाई अगर छूट गई तो जीवन में कुछ भी हासिल नहीं होगा। हमारे नन्हें मुन्नो के चेहरे में हंसी लाने के लिए वह दिन रात पढ़ाई करते हैं जिसके एवज में वह अपने जीवनयापन के लिए फीस नुमा कोई चीज मांगते हैं।
मेरी मुरझाई सी बेटी खिलने वाली है। और मैं अपने डॉक्टर को धन्यवाद देती हूं। लाख-लाख धन्यवाद।
पुनीता
रविवार, 8 मार्च 2009
मैं और महिला दिवस
कल महिला दिवस था और अनेक कार्यकम्र आयोजित किए गए। इस मौके पर महिलाएं बोली और बोलती चली गई। आदतन तो अब नहीं कहा जा सकता क्यों कि अब माहोल पहले जैसा नहीं है। लोग पहले कह दिया करते थे कि अरे महिलाओं का दिमाग तो घुटने में रहता है। या रामायण की उक्ति कि ढोल, गवांर, शुद्र, पशु, नारी सभी ताड़न के अधिकारी। समय था जब महिला की तुलना पशु से की जाती थी। पर अब नारी सशक्त है कारण उसका आथिर्क विकास हो रहा है। पारिवारिक जिम्मेदारियां के साथ आर्थिक जिम्मेदारियां भी वह बखुबी वहन कर रही है। इसलिए उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ रही है।
कल महिला दिवस के उपलक्ष्य पर आयोजित एक कार्यक्रम की मैं भी साझेदार बनी और महिला वक्ताओं को सुना। प्रसिद्ध वक्ताऐं थी और सभी ने अपनी बात सबके सामने रखी। बिना किसी का नाम लिए मैं बताना चाहुंगी कि महिला दिवस पर एक महिला आयोग की सदस्या ने खूब लम्बे चौड़े अपने भाषण में सिर्फ और सिर्फ यही बताया कि हमारी सरकार नारी मुक्ति आंदोलन को किस तरह बढ़ावा दे रही है। कितने तरह के कानून बना रखा है महिला की सुरक्षा के लिए। अफसोस, अनपढ़ तो ना सही पर पढ़ी लिखी महिला भी उन सारे कानूनी अधिकार को नहीं जानती। और वह सामाजिक, व्यवसायिक, मानसिक, घरेलू अत्याचार की शिकार बनती रहती है। अत्याचार शब्द से ही गुलामी की बू आती है। हर कोई अपने से कमजोर पर ही अत्याचार करता है। इसतरह महिला पुरुष प्रधान सामाज में सबसे कमजोर मानी जाती है वह बड़ी आसानी से अत्याचार की शिकार हो जाती है। जो धीरे धीरे दासता की ओर ले जाता है ओर महिला इसे समझ नहीं पाती। एक समय आता है जब महिला पूरी तरह दासत्व प्रसन्नता से स्वीकार करती है। और कई बार हमारे पढ़े लिखे समाज में पढ़ी लिखी महिला इमोशनल अत्याचार की भी शिकार होती है।
कानून जानना, समझना और याद रखना यह जरुरी है हर महिला को। ऐसा महिला आयोग के सदस्या मानती है।
फिर वक्ता थी एक मैटरीमोनियल वकील- सुंदर, सोम्य, वाचाल। पर उसने खरी खरी सुनाई। मीड़िया के लोगों के द्नारा उसका गलत इस्तमाल और कानून के लचिलेपन को जिसका लोग फायदा उठाते हैं। उसने भी यही कहा कि हर महिला को कानून जानना समझना चाहिए पर उसका दुरउपयोग नहीं करना चाहिए। व्यवसायिक जिम्मेदारियों के साथ हर महिला को घरेलू जिम्मेदारी को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। आर्थिक तौर पर मजबूत महिला को यह समझना चाहिए कि मातृत्व जो उन्हें वरदान में मिला है उसे वह सवारे। औऱ वह पारिवारिक जिम्मेदारियों से कभी मुंह ना मोड़े। परिवार ही भारत की जीड़ीपी रेट को आगे बढ़ाता है। हर व्यवसायिक मां अगर अपने बच्चे को ठीक तरह से दुलार, संस्कार दे पाएगी तभी एक उज्जवल चरित्र का विकास हो पाएगा।
फिर तीसरी महिला जो दो बार माउंट एवरेट फतह कर चुकी थी ने अपने जीवन के कुछ अनमोल लम्हे हमारे साथ बांटा। हरियाणा की यह जाट लड़की ने किस तरह सभी की मर्जी को रखते हुए अपना लक्ष्य साधा। उन्होने यह बताने की कोशिश की कि हर महिला को अपने जीवन में एक प्लान कर लेना चाहिए और उस प्लान के तहत बहुत आहिस्ते आहिस्ते से अपने मंजिल को साधना चाहिए। दृढ़ निश्चय ही हर महिला की सफलता की कुंजी है। मुझे उनकी बात बहुत अच्छी लगी।
युनिसेफ की प्रतिनिधी ने भी अपनी बातों को रखा। वह बंगाल, भारत, नेपाल में हो रही महिलाओं बॉडर ट्रैफिकिंग की पीड़ा को रखने की कोशिश की। वह महिला पर विश्व में हो रहे अत्याचार पर भी विचार विमर्श की। हर घंटे होने वाले महिला रेप के आंकड़े को बताते हुए कहा कि मैं यह सोच कर ड़र जाती हूं कि अगर यही रेप या टैफिकिंग मेरे अपने नाती, पोते या रिस्तेदार के साथ हो तो मुझ पर क्या बीतेगी. वैसा ही उन महिलाओं के संवेदन को महसुस करते हुए उन्होने अपनी मौत की भी परवाह न करते हुए कहा है कि वह अफगानिस्तान में महिला उत्थान का कार्यक्रम चलाएगी।
रंभा ने भी अपने अनुभवों के द्वारा यह बताया कि अब पुरुषवर्ग बदल रहा है। व्यवसायिक महिला को घरेलु कामों में मद्द की जाती है वहीं घरेलु महिला भी आर्दश समाज की कल्पना कर रही है। जहां घरेलु हिंसा का आंकड़ा नगण्य हो।
इस तरह कई लोग अपने मंतव्य को रखते हुए कार्यक्रम को समाप्ती की ओर ले गए और अंतिम में यह गुजारिश रही की ऐसी बैठक होती रहनी चाहिए जब महिलाए आपस में बातचीत कर सके।
मैं एक हाउस मेड़ महिला हूं। जो अपने जीवन को बहुत ही प्रैक्टीकल ढंग से चला रही है। मेरे छोटे से घर में मेरे हसबैंड़, मेरी दो बेटियां, मां और भतीजा रहता है। हमारा घर घरेलु हिंसा से तो मुक्त है ही और नारी प्रधान भी है। पुरुषों की बात घर के अंदर नहीं चलती वे बाहर में प्रधान होंगे पर हमदोनो घर के प्रधान हैं। सासुमां ने जो कह दिया पापा उसे अक्षरस्य मानते हैं और मेरे पति अपने पिता के ही कदमों पर चलना पसंद करते हैं। हमारे घर में भी झगड़े होते हैं पर अगले ही पांच मिनट में वह सब ठीक हो जाता है। क्योंकि हम सब यह जानते हैं कि हमसब आपस में प्यार करते हैं और यह लड़ाई मात्र विचारों की है। किसी को किसी से वैर नहीं है सब एक दूसरे का भला देखना चाहते हैं। कभी कभार विचार नहीं मिले तो बर्तन खनक जाता है पर वह दूसरे ही पल स्थिर हो जाता है। इस तरह मैं ने कभी कोई कानून नहीं जाना और नहीं जानना चाहती हूं। घर एक मंदिर है जहां आपको सुख और शांति मिलती है और जहां आप अपने आप को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। तो वैसी जगह की शांति भंग करने का किसी को भी अधिकार नहीं है। उन सारी महिलाओं से भी यही कहना चाहुंगी कि हर आदमी बहुत सुंदर है उसका मन बहुत सुंदर है बस जरुरत है उसे समझने की। अपने को बाजार के आधुनिकरण से रोकने की। बाजार जो एक पढ़ी लिखी एमबीए लड़की को प्रेम विवाह करने के बावजूद दो महिने में ही विच्छेद करा सकता है। वह हम सब के जीवन में कई खाई पैदा कर सकता है। यह आंखों देखी बात है। बाजार को दोष इसीलिए मैं देती हूं कि पहले ऐसी घटना नहीं होती थी पर आज हो रही है। बाजार सब के सर चढ़ बोल रहा है। एक कपड़े से संतुष्टी नहीं हैं। नये नये चाहिए वह भी कुछ हटकर। यह हटकर का जमाना है।
हम महिला भी अगर थोड़ा हटकर सोचें तो पुरुष सत्तात्मक समाज की ड़ोर धीरे से अपनी ओर खींच सकते हैं। बिना किसी आहट के, बिना किसी आंदोलन के, और बिना किसी कानून के। सिर्फ सच्चा समर्पण अपने पति के प्रति, अपने परिवार के प्रति, अपने समाज के प्रति हो तो नारी कभी भी अबला नहीं थी और आज भी अबला नहीं है।
कल महिला दिवस के उपलक्ष्य पर आयोजित एक कार्यक्रम की मैं भी साझेदार बनी और महिला वक्ताओं को सुना। प्रसिद्ध वक्ताऐं थी और सभी ने अपनी बात सबके सामने रखी। बिना किसी का नाम लिए मैं बताना चाहुंगी कि महिला दिवस पर एक महिला आयोग की सदस्या ने खूब लम्बे चौड़े अपने भाषण में सिर्फ और सिर्फ यही बताया कि हमारी सरकार नारी मुक्ति आंदोलन को किस तरह बढ़ावा दे रही है। कितने तरह के कानून बना रखा है महिला की सुरक्षा के लिए। अफसोस, अनपढ़ तो ना सही पर पढ़ी लिखी महिला भी उन सारे कानूनी अधिकार को नहीं जानती। और वह सामाजिक, व्यवसायिक, मानसिक, घरेलू अत्याचार की शिकार बनती रहती है। अत्याचार शब्द से ही गुलामी की बू आती है। हर कोई अपने से कमजोर पर ही अत्याचार करता है। इसतरह महिला पुरुष प्रधान सामाज में सबसे कमजोर मानी जाती है वह बड़ी आसानी से अत्याचार की शिकार हो जाती है। जो धीरे धीरे दासता की ओर ले जाता है ओर महिला इसे समझ नहीं पाती। एक समय आता है जब महिला पूरी तरह दासत्व प्रसन्नता से स्वीकार करती है। और कई बार हमारे पढ़े लिखे समाज में पढ़ी लिखी महिला इमोशनल अत्याचार की भी शिकार होती है।
कानून जानना, समझना और याद रखना यह जरुरी है हर महिला को। ऐसा महिला आयोग के सदस्या मानती है।
फिर वक्ता थी एक मैटरीमोनियल वकील- सुंदर, सोम्य, वाचाल। पर उसने खरी खरी सुनाई। मीड़िया के लोगों के द्नारा उसका गलत इस्तमाल और कानून के लचिलेपन को जिसका लोग फायदा उठाते हैं। उसने भी यही कहा कि हर महिला को कानून जानना समझना चाहिए पर उसका दुरउपयोग नहीं करना चाहिए। व्यवसायिक जिम्मेदारियों के साथ हर महिला को घरेलू जिम्मेदारी को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। आर्थिक तौर पर मजबूत महिला को यह समझना चाहिए कि मातृत्व जो उन्हें वरदान में मिला है उसे वह सवारे। औऱ वह पारिवारिक जिम्मेदारियों से कभी मुंह ना मोड़े। परिवार ही भारत की जीड़ीपी रेट को आगे बढ़ाता है। हर व्यवसायिक मां अगर अपने बच्चे को ठीक तरह से दुलार, संस्कार दे पाएगी तभी एक उज्जवल चरित्र का विकास हो पाएगा।
फिर तीसरी महिला जो दो बार माउंट एवरेट फतह कर चुकी थी ने अपने जीवन के कुछ अनमोल लम्हे हमारे साथ बांटा। हरियाणा की यह जाट लड़की ने किस तरह सभी की मर्जी को रखते हुए अपना लक्ष्य साधा। उन्होने यह बताने की कोशिश की कि हर महिला को अपने जीवन में एक प्लान कर लेना चाहिए और उस प्लान के तहत बहुत आहिस्ते आहिस्ते से अपने मंजिल को साधना चाहिए। दृढ़ निश्चय ही हर महिला की सफलता की कुंजी है। मुझे उनकी बात बहुत अच्छी लगी।
युनिसेफ की प्रतिनिधी ने भी अपनी बातों को रखा। वह बंगाल, भारत, नेपाल में हो रही महिलाओं बॉडर ट्रैफिकिंग की पीड़ा को रखने की कोशिश की। वह महिला पर विश्व में हो रहे अत्याचार पर भी विचार विमर्श की। हर घंटे होने वाले महिला रेप के आंकड़े को बताते हुए कहा कि मैं यह सोच कर ड़र जाती हूं कि अगर यही रेप या टैफिकिंग मेरे अपने नाती, पोते या रिस्तेदार के साथ हो तो मुझ पर क्या बीतेगी. वैसा ही उन महिलाओं के संवेदन को महसुस करते हुए उन्होने अपनी मौत की भी परवाह न करते हुए कहा है कि वह अफगानिस्तान में महिला उत्थान का कार्यक्रम चलाएगी।
रंभा ने भी अपने अनुभवों के द्वारा यह बताया कि अब पुरुषवर्ग बदल रहा है। व्यवसायिक महिला को घरेलु कामों में मद्द की जाती है वहीं घरेलु महिला भी आर्दश समाज की कल्पना कर रही है। जहां घरेलु हिंसा का आंकड़ा नगण्य हो।
इस तरह कई लोग अपने मंतव्य को रखते हुए कार्यक्रम को समाप्ती की ओर ले गए और अंतिम में यह गुजारिश रही की ऐसी बैठक होती रहनी चाहिए जब महिलाए आपस में बातचीत कर सके।
मैं एक हाउस मेड़ महिला हूं। जो अपने जीवन को बहुत ही प्रैक्टीकल ढंग से चला रही है। मेरे छोटे से घर में मेरे हसबैंड़, मेरी दो बेटियां, मां और भतीजा रहता है। हमारा घर घरेलु हिंसा से तो मुक्त है ही और नारी प्रधान भी है। पुरुषों की बात घर के अंदर नहीं चलती वे बाहर में प्रधान होंगे पर हमदोनो घर के प्रधान हैं। सासुमां ने जो कह दिया पापा उसे अक्षरस्य मानते हैं और मेरे पति अपने पिता के ही कदमों पर चलना पसंद करते हैं। हमारे घर में भी झगड़े होते हैं पर अगले ही पांच मिनट में वह सब ठीक हो जाता है। क्योंकि हम सब यह जानते हैं कि हमसब आपस में प्यार करते हैं और यह लड़ाई मात्र विचारों की है। किसी को किसी से वैर नहीं है सब एक दूसरे का भला देखना चाहते हैं। कभी कभार विचार नहीं मिले तो बर्तन खनक जाता है पर वह दूसरे ही पल स्थिर हो जाता है। इस तरह मैं ने कभी कोई कानून नहीं जाना और नहीं जानना चाहती हूं। घर एक मंदिर है जहां आपको सुख और शांति मिलती है और जहां आप अपने आप को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। तो वैसी जगह की शांति भंग करने का किसी को भी अधिकार नहीं है। उन सारी महिलाओं से भी यही कहना चाहुंगी कि हर आदमी बहुत सुंदर है उसका मन बहुत सुंदर है बस जरुरत है उसे समझने की। अपने को बाजार के आधुनिकरण से रोकने की। बाजार जो एक पढ़ी लिखी एमबीए लड़की को प्रेम विवाह करने के बावजूद दो महिने में ही विच्छेद करा सकता है। वह हम सब के जीवन में कई खाई पैदा कर सकता है। यह आंखों देखी बात है। बाजार को दोष इसीलिए मैं देती हूं कि पहले ऐसी घटना नहीं होती थी पर आज हो रही है। बाजार सब के सर चढ़ बोल रहा है। एक कपड़े से संतुष्टी नहीं हैं। नये नये चाहिए वह भी कुछ हटकर। यह हटकर का जमाना है।
हम महिला भी अगर थोड़ा हटकर सोचें तो पुरुष सत्तात्मक समाज की ड़ोर धीरे से अपनी ओर खींच सकते हैं। बिना किसी आहट के, बिना किसी आंदोलन के, और बिना किसी कानून के। सिर्फ सच्चा समर्पण अपने पति के प्रति, अपने परिवार के प्रति, अपने समाज के प्रति हो तो नारी कभी भी अबला नहीं थी और आज भी अबला नहीं है।
गुरुवार, 5 मार्च 2009
रजास्थान का नवलगढ़ या हमारा बिहार का पूसा
सुबह के उजाले से पहले हम राजस्थान के नवलगढ़ इलाके में पहुंच गए थे. गाड़ी से उतरते ही ऐसा लगा कि हम एक उच्चकोटी के वयवस्था में अपना तीन दीन व्यतीत करेंगे. हमें कमरा सबसे ऊपर और किनारे में दिया गया था शायद बच्चों के शोर को देखते हुए। कमरे में घुसने तक लग रहा था कि यह किसी पूर्व राजा का महल होगा। कमरे की सोजो सज्जा भी मनमोहक थी और पूरा महल रुची पूर्ण ढंग से सजा हुआ था। मैं यहां आने के पहले नवलगढ़ का नाम तक नहीं जानती थी। और शायद आप भी नहीं जानते हों। सोची इतनी छोटी जगह पर क्या देखने को मिलेगा। पर मैं सचमुच गलत थी मैने तीन दिन में जो कुछ देखा सुना वह मेरे सोच को अब ज्यादा व्यापक और समृद्ध बना दिया है।
नवलगढ़ जो शेखावटी के नाम से भी प्रसीद्ध है, राजा शेखावट द्वारा बनाया हुआ है। रुप विलास पैलस उनका ही था और वह अच्छे लम्बे चौड़े जगह में फैला हुआ है। पहले जैसा भी रहा हो पर अब पैलस को हेरीटेज के रुप में बदल कर विदेशी पर्यटकों को लुभाता है। सभी कुछ कायदे में चलता है आतिथ्य का भरपूर लुत्फ उठाया जा सकता है। बाग-बगीचे के साथ लगा खेत खलीहान सुबह को अति रोमांचित कर देता है। चुकि हम दिल्ली में रहते हैं और सुबह को कभी महसुस नहीं कर पाते इसलिए हमारी सुबह तोते और मोर के आवाज को सुनते और उन्हें देखते कभी नहीं होती। इसलिए यह हमारे लिए अति आनंद का क्षण था जब मोर को यूं खुले में घूमते हुए अपनी बच्ची को दिखाना। कुल मिलाकर सुबह की जो कल्पना की जा सकती है वह स्वार्गीक होती है और ऐसा ही हम वहां देख रहे थे।
विदेशी-देशी पर्यटकों को बुलाने के लिए एक कार्यशाला का आयोजन मोनारक्का की हवेली में किया गया था। पक्ष-विपक्ष में बातें हो रही थी। औरगैनिक लंच की व्यवस्था लोगों ने खेतों के बीच में की थी। वहां पर सारा खाना औरगैनिक तरीके से उपजाया हुआ था। और खीलाने का ढंग भी बिल्कुल देशी। खटीया ड़ाल कर बैठाया गया और पानी भी औरगैनिक पीलाई गई मतलब कुएँ का पानी।
राजस्थान जिसे हम रेतों का शहर भी कह सकते हैं और जहां पर्यटक रेत देखने और ऊँट की सवारी करने के लिए जाते हैं उस राजस्थान के नवलगढ़ को मैने एक नए रुप में देखा। वह था एक दृढ़ नवलगढ़ जो धरती आग उगलती थी वहीं अब हरे भरे खेत दिखते हैं. जहां पानी का कोई स्त्रोत नहीं है वहीं पानी लाया जाता है। पर वहां के लोग अपनी धरती को उर्वरा करने के लिए उससे अत्यधिक पैदावार की अपेक्षा नहीं करते बल्कि पुरानी पद्धती का अपनाते हुए खेती कर रहें हैं। औरगैनिक खेती मतलब वैसी खेती जहां पर हम मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए देशी खाद का उपयोग करते हैं। ना ऊपर से और ना ही मिट्टी में ही कोई रासायनिक छिड़काव किया जाता है। कीट पतंगों को मारने के लिए भी देशी तरीका अपनाया जाता है। किसान लोग अब समृद्ध हो रहें है इस तरह की खेती से उन्हें सामान के अच्छे दाम मिलते हैं। पुरानी पद्धती जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता था वह अब इस्तमाल किया जा रहा है। लोग अपने खेतों की घटती उर्वराशक्ति से परेशान होकर ही ऐसा कदम उठाय हैं। इस दौरान उन्हें पानी की भी कम व्यवस्था करनी पडती है।
नवलगढ़ के लोगों के चेहरे में एक कठोरता झलकती है। सनस्क्रीन लगा कर कोमल लड़कियों की झलक मुझे वहां नहीं दिखी। स्कूल-कॉलेज जाते लड़के-लड़कियां भोले भाले से दिखे। ग्रामिण भी शरीर से कठोर और भोले भाले हैं। शाररिक कठोरता उन्हें विरासत में मिली है। अत्यधिक गर्मी और अत्यधिक शर्दी झेलने वाले लोग अपने आप को बचाकर अपने खेतों के उर्वरा शक्ति को बचाकर देश विदेश में अपने नाम कमा रहें हैं। छोटा सा शहर और पतली पलती गलियां जो सड़कों पर बढ़ते वाहन को वहन नहीं कर पा रहीं है और प्रायः गांव जाम का शिकार हो जाता है जिसे ठीक होने में घंटो लग जाते हैं। नागरीय वयवस्था को ठीक करने के लिए वहां के विधायक डॉ अजय कुमार अब दृढ़ संकल्प दिखते हैं।
पर्यटन के विकास की पूरी संभावना अब बन रही है और विकसित भी हो रही है। पर्यटक पहले से ही दिल्ली से सटे राज्य घूमने राजस्थान जाते रहें हैं। नवलगढ़ भी अब उनका नया गंतव्य बन रहा है कारण कई है- यहां हवेलियों की बहुत संख्या है. मोनारक्का की हवेली को तो यूं ही रखा गया है और बिना रंग रोगन के दर्शनिय बनाया गया है। वहीं पोद्दार की हवेली को आधुनिक तरीके से सजाया गया है और उस हवेली में पूरे राजस्थान के लोक की झलक मिलती है। जैसे ऊँट की तरह तरह की बग्घी, पगड़ियों की विभिन्न शैली, गहनों, कपड़ों का कलेक्शन काफी मजेदार था। औरगैनिक खेती को दिखाने और उसी पृष्टभूमि में आतिथ्य सतकार करने के लिए ग्रामिणों ने रुरल टुरिज्म का रुप तैयार किया है। वह भी आश्चर्यजनक रुप से फलित हो रहा है। और औरगैनिक खेती को समझने और समझाने के लिए तो दर्शनिय तो हो ही गया है।
मैं वहां से लौटकर अपने दादी घर को याद कर रही थी कि लगभग वैसा ही मेरे दादा जी द्वारा बनाया गया शांति-निकेतन है जो दुर्भाग्य से बिहार के पूसा में है। बिहार जिसे देखने कोई पर्यटक बमुशिकल पहुंच पाता है और वह भी पूसा नहीं जाता। गया, पटना देखकर अपनी भारत यात्रा समाप्त समझता है। वहीं मेरा घर जो विशाल हवेलीनुमा है हांलाकि उसमें कोई चित्रकारी नहीं पर चारों तरफ से जमीन और फुलवारी से घिरा हुआ है। घर के सामने पूसा कृषि विज्ञान का लहलहाता खेत है। और हमारे घर के पिछवाड़े काफी दूर दूर तक खेत है। घर पूसा कृषी विज्ञाण के बगल में होने के और रोड़ पर होने के कारण लोग पुरानी पड़े हमारे घर को दूर से देखते हुए जाते हैं। घर पर एक कोने पर बना महावीर मंदिर भी है जिसे लोग प्रणाम करते हुए जाते हैं। और पुराने लोग डॉक्टर साहब की हवेली को देखते हैं।
पर मैं अगर यह सोचुं कि मैं उस घर को आबाद करुंगी और उसे दर्शनिय बनाने के लिए हेरिटेज का रुप दुंगी जिससे देशी पर्यटक या पूसा कृषि विज्ञाण के छात्र-छात्रा रह सकें तो यह मेरे लिए संभव नहीं होगा। कारण भी कई हैं। बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था बहुत लाचार है। बिहार जैसे गांव में उन्नति की बात कई बार प्राण घातक होती है। पूसा में घर से लगे बाजार में दिनदहाड़े एक डॉक्टर को गोली मार दी गई। और यह समाचार आम है।
बिहार में प्रशासन भी उतना ही कमजोर है जितना वहां के लोग। लोगों में भी हिम्मत नहीं है। लालू जो पंद्रह सालों तक खुद और फिर अपनी निरक्षर पत्नी को सत्ता में बिठाकर यह साबित कर दिया कि बिहार में उसकी तूती बोलती है। बिहारी लोग पूरे भारत में फैले हुए हैं और उनकी हालत किसी से भी छुपी नहीं है। बिहारी पहले एक गाली हुआ करती थी पर अब स्थिति वैसी नहीं रही। प्रशासन बदले ना बदले लोग जगह छोड़ कर अपने खुद का विस्तार कर रहें हैं। नवलगढ़ के लोगों की भी स्थिति वैसी ही है वहां प्रशासन कोई कदम नहीं उठाता पर वह आतंक के साये से मुक्त हैं। दिन दहाड़े हत्या नहीं होती। मेहनतानुसार लोग पैसे पाते है। गृह उद्योग भी बंधेज के काम से भरा पड़ा है। पर पूसा में ना तो कोई गृहउद्योग नुमा चीज है और ना ही हम वहॉं आतंक रहीत रह सकते हैं।
और आज कल के ही दौरान मुझे पता चला कि मेरी छोटी चाची ने खुद स्कूल खोला है। यह महज इतफाक था कि मैं वहां के बारे में सोच रही थी और यह सुखद समाचार मिल गया। हमारी शुभकामनाए और आप सभी का आशिर्वाद चाहिए बिहार के पूसा गांव में स्कूल को सफलता से चलाने के लिए। हेरिटेज ना सही पर घर एक विद्यालय बन जाय यह कुल की प्रतिष्ठा को तो बढ़ाता ही है।
नवलगढ़ जो शेखावटी के नाम से भी प्रसीद्ध है, राजा शेखावट द्वारा बनाया हुआ है। रुप विलास पैलस उनका ही था और वह अच्छे लम्बे चौड़े जगह में फैला हुआ है। पहले जैसा भी रहा हो पर अब पैलस को हेरीटेज के रुप में बदल कर विदेशी पर्यटकों को लुभाता है। सभी कुछ कायदे में चलता है आतिथ्य का भरपूर लुत्फ उठाया जा सकता है। बाग-बगीचे के साथ लगा खेत खलीहान सुबह को अति रोमांचित कर देता है। चुकि हम दिल्ली में रहते हैं और सुबह को कभी महसुस नहीं कर पाते इसलिए हमारी सुबह तोते और मोर के आवाज को सुनते और उन्हें देखते कभी नहीं होती। इसलिए यह हमारे लिए अति आनंद का क्षण था जब मोर को यूं खुले में घूमते हुए अपनी बच्ची को दिखाना। कुल मिलाकर सुबह की जो कल्पना की जा सकती है वह स्वार्गीक होती है और ऐसा ही हम वहां देख रहे थे।
विदेशी-देशी पर्यटकों को बुलाने के लिए एक कार्यशाला का आयोजन मोनारक्का की हवेली में किया गया था। पक्ष-विपक्ष में बातें हो रही थी। औरगैनिक लंच की व्यवस्था लोगों ने खेतों के बीच में की थी। वहां पर सारा खाना औरगैनिक तरीके से उपजाया हुआ था। और खीलाने का ढंग भी बिल्कुल देशी। खटीया ड़ाल कर बैठाया गया और पानी भी औरगैनिक पीलाई गई मतलब कुएँ का पानी।
राजस्थान जिसे हम रेतों का शहर भी कह सकते हैं और जहां पर्यटक रेत देखने और ऊँट की सवारी करने के लिए जाते हैं उस राजस्थान के नवलगढ़ को मैने एक नए रुप में देखा। वह था एक दृढ़ नवलगढ़ जो धरती आग उगलती थी वहीं अब हरे भरे खेत दिखते हैं. जहां पानी का कोई स्त्रोत नहीं है वहीं पानी लाया जाता है। पर वहां के लोग अपनी धरती को उर्वरा करने के लिए उससे अत्यधिक पैदावार की अपेक्षा नहीं करते बल्कि पुरानी पद्धती का अपनाते हुए खेती कर रहें हैं। औरगैनिक खेती मतलब वैसी खेती जहां पर हम मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए देशी खाद का उपयोग करते हैं। ना ऊपर से और ना ही मिट्टी में ही कोई रासायनिक छिड़काव किया जाता है। कीट पतंगों को मारने के लिए भी देशी तरीका अपनाया जाता है। किसान लोग अब समृद्ध हो रहें है इस तरह की खेती से उन्हें सामान के अच्छे दाम मिलते हैं। पुरानी पद्धती जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता था वह अब इस्तमाल किया जा रहा है। लोग अपने खेतों की घटती उर्वराशक्ति से परेशान होकर ही ऐसा कदम उठाय हैं। इस दौरान उन्हें पानी की भी कम व्यवस्था करनी पडती है।
नवलगढ़ के लोगों के चेहरे में एक कठोरता झलकती है। सनस्क्रीन लगा कर कोमल लड़कियों की झलक मुझे वहां नहीं दिखी। स्कूल-कॉलेज जाते लड़के-लड़कियां भोले भाले से दिखे। ग्रामिण भी शरीर से कठोर और भोले भाले हैं। शाररिक कठोरता उन्हें विरासत में मिली है। अत्यधिक गर्मी और अत्यधिक शर्दी झेलने वाले लोग अपने आप को बचाकर अपने खेतों के उर्वरा शक्ति को बचाकर देश विदेश में अपने नाम कमा रहें हैं। छोटा सा शहर और पतली पलती गलियां जो सड़कों पर बढ़ते वाहन को वहन नहीं कर पा रहीं है और प्रायः गांव जाम का शिकार हो जाता है जिसे ठीक होने में घंटो लग जाते हैं। नागरीय वयवस्था को ठीक करने के लिए वहां के विधायक डॉ अजय कुमार अब दृढ़ संकल्प दिखते हैं।
पर्यटन के विकास की पूरी संभावना अब बन रही है और विकसित भी हो रही है। पर्यटक पहले से ही दिल्ली से सटे राज्य घूमने राजस्थान जाते रहें हैं। नवलगढ़ भी अब उनका नया गंतव्य बन रहा है कारण कई है- यहां हवेलियों की बहुत संख्या है. मोनारक्का की हवेली को तो यूं ही रखा गया है और बिना रंग रोगन के दर्शनिय बनाया गया है। वहीं पोद्दार की हवेली को आधुनिक तरीके से सजाया गया है और उस हवेली में पूरे राजस्थान के लोक की झलक मिलती है। जैसे ऊँट की तरह तरह की बग्घी, पगड़ियों की विभिन्न शैली, गहनों, कपड़ों का कलेक्शन काफी मजेदार था। औरगैनिक खेती को दिखाने और उसी पृष्टभूमि में आतिथ्य सतकार करने के लिए ग्रामिणों ने रुरल टुरिज्म का रुप तैयार किया है। वह भी आश्चर्यजनक रुप से फलित हो रहा है। और औरगैनिक खेती को समझने और समझाने के लिए तो दर्शनिय तो हो ही गया है।
मैं वहां से लौटकर अपने दादी घर को याद कर रही थी कि लगभग वैसा ही मेरे दादा जी द्वारा बनाया गया शांति-निकेतन है जो दुर्भाग्य से बिहार के पूसा में है। बिहार जिसे देखने कोई पर्यटक बमुशिकल पहुंच पाता है और वह भी पूसा नहीं जाता। गया, पटना देखकर अपनी भारत यात्रा समाप्त समझता है। वहीं मेरा घर जो विशाल हवेलीनुमा है हांलाकि उसमें कोई चित्रकारी नहीं पर चारों तरफ से जमीन और फुलवारी से घिरा हुआ है। घर के सामने पूसा कृषि विज्ञान का लहलहाता खेत है। और हमारे घर के पिछवाड़े काफी दूर दूर तक खेत है। घर पूसा कृषी विज्ञाण के बगल में होने के और रोड़ पर होने के कारण लोग पुरानी पड़े हमारे घर को दूर से देखते हुए जाते हैं। घर पर एक कोने पर बना महावीर मंदिर भी है जिसे लोग प्रणाम करते हुए जाते हैं। और पुराने लोग डॉक्टर साहब की हवेली को देखते हैं।
पर मैं अगर यह सोचुं कि मैं उस घर को आबाद करुंगी और उसे दर्शनिय बनाने के लिए हेरिटेज का रुप दुंगी जिससे देशी पर्यटक या पूसा कृषि विज्ञाण के छात्र-छात्रा रह सकें तो यह मेरे लिए संभव नहीं होगा। कारण भी कई हैं। बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था बहुत लाचार है। बिहार जैसे गांव में उन्नति की बात कई बार प्राण घातक होती है। पूसा में घर से लगे बाजार में दिनदहाड़े एक डॉक्टर को गोली मार दी गई। और यह समाचार आम है।
बिहार में प्रशासन भी उतना ही कमजोर है जितना वहां के लोग। लोगों में भी हिम्मत नहीं है। लालू जो पंद्रह सालों तक खुद और फिर अपनी निरक्षर पत्नी को सत्ता में बिठाकर यह साबित कर दिया कि बिहार में उसकी तूती बोलती है। बिहारी लोग पूरे भारत में फैले हुए हैं और उनकी हालत किसी से भी छुपी नहीं है। बिहारी पहले एक गाली हुआ करती थी पर अब स्थिति वैसी नहीं रही। प्रशासन बदले ना बदले लोग जगह छोड़ कर अपने खुद का विस्तार कर रहें हैं। नवलगढ़ के लोगों की भी स्थिति वैसी ही है वहां प्रशासन कोई कदम नहीं उठाता पर वह आतंक के साये से मुक्त हैं। दिन दहाड़े हत्या नहीं होती। मेहनतानुसार लोग पैसे पाते है। गृह उद्योग भी बंधेज के काम से भरा पड़ा है। पर पूसा में ना तो कोई गृहउद्योग नुमा चीज है और ना ही हम वहॉं आतंक रहीत रह सकते हैं।
और आज कल के ही दौरान मुझे पता चला कि मेरी छोटी चाची ने खुद स्कूल खोला है। यह महज इतफाक था कि मैं वहां के बारे में सोच रही थी और यह सुखद समाचार मिल गया। हमारी शुभकामनाए और आप सभी का आशिर्वाद चाहिए बिहार के पूसा गांव में स्कूल को सफलता से चलाने के लिए। हेरिटेज ना सही पर घर एक विद्यालय बन जाय यह कुल की प्रतिष्ठा को तो बढ़ाता ही है।
सोमवार, 23 फ़रवरी 2009
आज मेरी मिठी का पहला जन्मदिन है
बेटियों के ब्लाग पर लिखे हुए मुझे लगभग साल भर होने जा रहा है. पीछले साल मैं अपनी बेटियों के विषय में लिखी थी. और आज पुन अपनी बेटियों के बारे में लिखने के लिए उत्सुक हूं. मन में तूफान उमड़ घुमड़ रहा है. यह तूफान पूरी तरह से खुशी की है और अपने को श्रेष्ठ समझने की.
मेरी बड़ी बेटी श्रुति के छह साल बाद मुझे दूसरी संतान सुख की प्राप्ती हुई. अति सुंदर, प्यारी, मोहक औऱ ना जाने शब्द ना खत्म होने वाली बिटिया की मैं मां बन गई। बिटिया के जन्म से घर में कहीं कोई अफसोस की लहर नहीं थी. कदाचित मन में हो रही तूफान को घर के लोग दबा रहें हो पर मुझ तक बात नहीं पहुंच पाती. यह मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे कहीं से ताने बाने सुनने को नहीं मिले.
दिन गुजरते रहे हांलाकि हमने उसके आने की खुशी में कोई पार्टी नहीं की पर हर दिन हमारे घर में उसके आने के बाद उत्सव सा माहोल बना रहा. हम दिन दूनी रात चौगुनी प्रगती करते रहे. सुख और शांति तो हमलोगों के मन में पहले से थी पर अब सुकून का एहसास भी होने लगा था. उसके पैर इतने अच्छे कि हमलोग अपने नए घर में शिफ्ट कर गए.
मेरे सपने थे कि मैं नए घर में अपनी बिटिया को लाल रंग के वॉकर पर घूमती देखूं. और यह भी सपना सच हो गया. वह ज्योंहि बैठने लगी हमलोग नये घर में आ गए थे.
उसकी प्यारी हंसी..... कुछ नहीं कह पाऊंगी.
नाम हमलोगों ने उसका घर पर मिठी रखा है. और बाहर का नाम अनुभूति.
नाम को लेकर काफी लोग उसे कुछ भी कहते हैं. एक तीखी और एक मिठी. सचमुच ऐसी ही है पर ऐसा कहना किसी को नहीं चाहिए. मेरी श्रुति को बुरा लगता है. श्रुति को पानीपत में उसका एक प्यारा सा दोस्त श्रुति प्रुति कहता था तो वह बहुत खुश होती थी. तो मेरी मिठी को खट्टी-मिठी, या मेथी या मिट्टी कहकर लोग प्यार से उसका नाम बिगाड़ते हैं. और वह बहुत शालीन है. जब से उसके पैर हुए हैं मतलब जब से वह चलना सीखी है बस चलती रहती है. दिनभर चलती रहेगी. औऱ कुछ कुछ सामान छुती रहेगी. बर्तन फैला कर खेलेगी, आलमारी से कपड़े निकाल कर इधर उधर बीखेरेगी, और ना जाने हमारा घर कई सामानों से बीखरा रहेगा. किसी की अगर चीज नहीं मिल रही हो तो सबका पहला शक मिठी पर ही जाता है. चार्जर कहां है भाई- तो पलंग के पीछे होगा, मिठी का पैंट नहीं मिल रहा वह भी पलंग के पीछे, सुबह का अखबार भी प्राय वहीं मिल जाएगा. मोबाइल बजता हो और कहीं ना मिले तो हमपहले पलंग के नीचे ही खोजते हैं.
उसे मैं कहीं ले जाती हूं तो मुझे बड़ा फक्र होता है. अब मुझे जाननेवाले कई लोग सोचेंगे कि क्या मैं अपनी बड़ी बेटी को भूल गई हूं. तो भाई कतई नहीं. मेरी दोनो बेटियां मेरी दो मजबूत बाजू है. मुझे दोनो पर बड़ा गर्व है. श्रुति काफी तेज है दिमाग से और काफी उर्जावान. मिठी गंभीर है और अभी उसकी तेजी का पता नहीं चला है. मैं वैसी मां नहीं हूं कि बच्चे ने सक्रूड्राइवर क्या घूमा दिया तो कहने लगे अरे मेरा बच्चा तो इंजिनीयर बनेगा. मेरी श्रुति पढ़ाई में ड़ांस में बोलने में तेज है.
श्रुति स्कूल जाते समय कहते हुए जाती है कि आज मैं तेरा नाम रौशन कर के आऊंगी. मतलब की स्कूल में प्रेयर के समय कोई भी मोरल स्टोरी सुना कर आऊंगी. मैं उसे मोरल स्टोरी याद करवाती हूं और वह पांच मिनट तक स्टोरी सुना कर आती है.
आज मेरी बिटिया का जन्मदिन है. वह पूरे साल भर की हो गई. प्यारी सी, खूबसुरत सी मेरी बेटी कुछ वर्षो में यूं ही बर्थडे मनाते हुए मुझ से दूर चली जाएगी. मुझे पता है ऐसा सब के साथ होता है। .....
सो इसलिए मैं आज का दिन भरपूर जीऊंगी. हर दिन उसका मेरे साथ किमती रहेगा. वह मेरे पास अपने व्यक्तिव विकास के लिए है उसके बाद तो उसे खुद ही अपना जीवन को मुकाम पर लाना है।
शनिवार, 31 जनवरी 2009
समाज बदल रहा है
बहुत ही रोचक घटना हुई जो मुझे सोचने पर विवश कर दिया. घटना की जगह थी लेडी़ज ब्यूटी पार्लर. चार महिलाओं के बीच हुई बातचीत. ब्यूटिशियन ने काम खत्म करते ही औपचारिक तौर पर एक लेड़ी को कहा, (जो अपनी सासुमां के साथ गर्भावस्था के दौरान अपने को सुंदर दिखने के लिए आई थी) कि अपना ख्याल रखा करो, खूब हरी सब्जी, दाल वैगरह लिया करना. और अगली बार लड़डू लेकर ही आना। वो लेड़ी समझ गई कि उससे बेटे की फरमाइश की जा रही है. उसने तुरंत अपना कमान संभाला और दिया लेक्चर. जो मैं भी यदा कदा पहले दिया करती थी. कि अरे मेरे घर में तो किसी को बेटी की वैसी कोई ख्वाहिश नहीं हैं हमारे पापा बहुत अच्छे हैं. मेरी सासुमां( जो साथ ही में थी ) भी बहुत अच्छी है. टच वुड़ मुझे तो बहुत अच्छा ससुराल मिला है सभी कोई बहुत अच्छे हैं. और बेटा बेटी की कोई चिंता नहीं है.
इन सारे प्रवचन के बाद वे दोनो चले गए. रह गई तो हम और ब्युटिशियन. चूकि मुझे भी इन दिनों सुंदर दिखने का जुनून सवार है सो मैं अब उसके सीट पर बैठ गई. और अब मैं शुरू हो गई प्रवचन देने. चूकि मैं और ब्युटिशियन दोनों ही दो बेटियों की मां है तो जख्म हमारा हरा हो उठा. उसके भोलेपन पर दया आ रही थी मुझे. हमदोनों ने अपनी अपनी व्यथा गाथा सुनाई कि कैसे समाज तरह तरह से आपको अपमानित करता है और बेटे उत्पादन को प्रोत्साहित करता है। हमारा परिवार अगर सचमुच भी बहुत अच्छा रहा तो भी हमें हरबार अपमानित होना पड़ता है. कई बार कई तरीके से....
मजेदार बात तो उस घटना कि यह भी थी कि आज समय कितना बदल चुका है बहुऐं खुलेआम अपने सास ससुर की तारीफ कर रही है. मैं नहीं कह सकती लोक कथाओं में या चरित्र निर्माण की कथाओं के अलावा आप किसी औरत को अपने सास ससुर की बड़ाई करते सुने होंगे. औपचारिकता बस कोई कर दे तो बात अलग हैं. मन को छू लेने वाली बात कही थी उस औरत ने. सचमुच आज का समाज और आज का समय कलह को त्यागना चाहता है और वह अपनी बहुओं को खुलेमन से स्वीकार करता है. घटना एक दो ही सही पर है तो. एक दो में मेरा भी वैसा ही परिवार है पर मैं कभी मां पापा के सामने खुले दिल से स्वीकार नहीं कर पाती. शायद यह मेरा अहंकार हो या फिर मेरा झिझक. मैं वैसे भीरु स्वभाव से हूं और हमेशा ड़रती हूं. अपनी खुशहाल भाग्य पर इतराती जरुर हूं पर दूसरों से छुपाती भी हूं. जो भी हो. मेरी उस महिला को शुभाकामना है कि वह एक स्वस्थ बच्चा जन्मे और खुद भी जल्द स्वस्थ हो जाए.
इन सारे प्रवचन के बाद वे दोनो चले गए. रह गई तो हम और ब्युटिशियन. चूकि मुझे भी इन दिनों सुंदर दिखने का जुनून सवार है सो मैं अब उसके सीट पर बैठ गई. और अब मैं शुरू हो गई प्रवचन देने. चूकि मैं और ब्युटिशियन दोनों ही दो बेटियों की मां है तो जख्म हमारा हरा हो उठा. उसके भोलेपन पर दया आ रही थी मुझे. हमदोनों ने अपनी अपनी व्यथा गाथा सुनाई कि कैसे समाज तरह तरह से आपको अपमानित करता है और बेटे उत्पादन को प्रोत्साहित करता है। हमारा परिवार अगर सचमुच भी बहुत अच्छा रहा तो भी हमें हरबार अपमानित होना पड़ता है. कई बार कई तरीके से....
मजेदार बात तो उस घटना कि यह भी थी कि आज समय कितना बदल चुका है बहुऐं खुलेआम अपने सास ससुर की तारीफ कर रही है. मैं नहीं कह सकती लोक कथाओं में या चरित्र निर्माण की कथाओं के अलावा आप किसी औरत को अपने सास ससुर की बड़ाई करते सुने होंगे. औपचारिकता बस कोई कर दे तो बात अलग हैं. मन को छू लेने वाली बात कही थी उस औरत ने. सचमुच आज का समाज और आज का समय कलह को त्यागना चाहता है और वह अपनी बहुओं को खुलेमन से स्वीकार करता है. घटना एक दो ही सही पर है तो. एक दो में मेरा भी वैसा ही परिवार है पर मैं कभी मां पापा के सामने खुले दिल से स्वीकार नहीं कर पाती. शायद यह मेरा अहंकार हो या फिर मेरा झिझक. मैं वैसे भीरु स्वभाव से हूं और हमेशा ड़रती हूं. अपनी खुशहाल भाग्य पर इतराती जरुर हूं पर दूसरों से छुपाती भी हूं. जो भी हो. मेरी उस महिला को शुभाकामना है कि वह एक स्वस्थ बच्चा जन्मे और खुद भी जल्द स्वस्थ हो जाए.
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