शुक्रवार, 20 मार्च 2009

मिठी और डॉक्टर


सुबह मेरी मिठी की तबियत बहुत खराब हो चुकी थी। अब उसे दस्त भी होने लगा था। पिछले दो दिन से उसे बुखार हो रहा था। पता नहीं चल पा रहा था कि उसे बुखार क्यों हो रहा है। खांसी तो थी पर ज्यादा नहीं थी। सांस लेने में उसकी छाती से आवाज आती थी। सोच रही थी कोई बात नहीं ठीक हो जाएगी यूं ही। और इसलिए मैंने उसे डॉक्टर को दिखाए बिना बुखार की दवा देती रही। अब मैं सोच रही हूं मैने ऐसा क्यों किया पहले ही डॉक्टर को क्यों नहीं दिखा लाई। तीन दिनों तक सोचती रही थी कि फालतु में सौ रुपय डॉक्टर को होम हो जाऐंगे और मेरी मिठी को एंटीबॉयटिक खाना पड़ जाएगा। दोनों ही स्थिति मेरे मन मुताबिक नहीं थी। इसलिए मैं अपना इलाज चलाने लगी। पति रोज कह कर जाते डॉक्टर को जरुर दिखवा लेना। पर मैं नहीं गई। बहाना बना दिया ताकि मेरे सौ रुपय बच जाएं औऱ मिठी एंटिबॉयटिक ना पीये।


दरअसल मिठी की तबियत खराब होने में कसूर ही मेरा है। उसे मैने जमकर ठंडे अंगूर खिला दिया था जो खराबी कर गया।


सोमवार की सुबह उसकी पहली दस्त देख कर मैं डॉक्टर के पास जाने का मन बना ली थी। और तैयार होते ही पंद्रह मिनट में एक और दस्त। घबड़ा गई। उसके चेहरे की हंसी गायब थी औऱ वह सुस्त पड़ रही थी। घर में अब कोई सवारी न होने के कारण मैं अपने पति के साथ ही पांव पैदल निकल गई। रिक्शेवाले को ढुंढा पर वह दस मिनट बाद ही आता और अब मैं उसका इंतजार नहीं कर सकती थी, मैं चल दी। डॉक्टर का पता पूछने मैं जैन मंदिर के अंदर घुस गई। वहां अंकल से पता पूछा और आग्रह के स्वर में बोला, क्या डॉक्टर साहब सौ रुपय से कम नहीं लेते। अंकल ने बड़ी अच्छी कही कि तुम कहना मैं जैन मंदिर से आई हूं पैसे थोड़ा कम ले लो। उन्होने कहा कि डॉक्टर आदमी के चेहरे देखकर पैसे की चपत मारते है। कुछ कर नहीं सकती थी इसलिए सड़क की लंबी चक्कर काटकर डॉक्टर के घर पहुंच गई। वहां पहले से एक मार्डन मां अपनी बिटिया का इलाज करवा रही थी। ड़ॉक्टर ने उसे बच्चे के सांस लेने में हो रही तकलीफ को कम करने के लिए एक मशीन में दवा डाल उसे उसका भाप देने का प्रयास करने लगा। और बच्ची थी कि लगातार रोई जा रही थी औऱ मुझे यह सब देखकर कोफ्त हो रही थी कि यह डॉक्टर अपने बिल को बढ़ाने के लिए इतना छल प्रपंच कर रहा है। बाद में डॉक्टर ने उसके सौ रुपय देने पर पचास रुपय वापस कर दिए। मुझे राहत हुई औऱ मैं खुश हो गई कि शायद घर पर दिखाने का फीस पचास रुपय हो और मार्केट वाली क्लीनिक का फीस 100 रुपय लेते होंगे। अब मेरी बारी आई, और मैं यह बताने की उन्हें कोशिश करती रही कि यह सारा दोष फ्रिज में रखे ठंडे अंगूर ज्यादा खिला ने से हुआ है। डॉक्टर ने उसे अच्छे से देखा, दवा लिखी और खाने का तरीका बता दिया। अब पैसे देने की बारी आई, मैने सौ रुपय का नोट उनके सामने रख दिया और पचास रुपय लौटने का इंतजार करने लगी पर डॉक्टर सौ रुपय ड्रावर में डाल उसे बंद कर चुके थे। मैं समझ गई पर धीरे से कहा सौ रुपय हैं फीस क्या और उन्होने लम्बी सी मुस्कान दे हल्का सा सर हिला दिया। औऱ भी पेर्शोंट थे और मैं बिना उनसे कुछ कहे वापस आ गई। सोचा चलो कोई बात नहीं मैने रिक्शे के तो 15 रुपय बचा ही लिए ना। मैं घर लौट चली आई रास्ते भर सोचती आई कि सौ रुपय बचाने के चक्कर में मैने बेकार अपना दिमाग लगाया औऱ डॉक्टर जमात को कोसने लगी कि यह पांच मिनट देखते हैं और बेफीजूल उसके सौ रुपय ले लेते हैं। डॉक्टर की दवा खाकर मिठी को आराम हुआ और वह सो गई अब वह अच्छा महसूस कर रही है।

और मैं अब यह सोच रहीं हूं कि मैं डॉक्टर को उनके फीस से ज्यादा कुछ नहीं दे पायी, पर उन्हें दुआ हमें जरुर देनी चाहिए।
और इसके लिए तो डॉक्टर ने तो मात्र सौ रुपय ही लिए। डॉक्टर जो कठिन मेहनत कर अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं,क्या उन्हें अपने बचपन में ज्यादा खेलने का मन नहीं करता होगा, क्या वह अधिक शैतानी करना नहीं चाहते होंगें, क्या उनका मन औरों को मस्ती कर देख बावला नहीं होता होगा। पर वह अपने मन को काबू में कर सिर्फ पढ़ाई करते हैं, मन को यह समझाते हैं कि मस्ती तो बाद में भी की जा सकती है पर पढ़ाई अगर छूट गई तो जीवन में कुछ भी हासिल नहीं होगा। हमारे नन्हें मुन्नो के चेहरे में हंसी लाने के लिए वह दिन रात पढ़ाई करते हैं जिसके एवज में वह अपने जीवनयापन के लिए फीस नुमा कोई चीज मांगते हैं।

मेरी मुरझाई सी बेटी खिलने वाली है। और मैं अपने डॉक्टर को धन्यवाद देती हूं। लाख-लाख धन्यवाद।

पुनीता

1 टिप्पणी:

  1. एक आम गृहिणी की साफ़गोई।

    मुझे ऐसा लगता है कि हम सबके (आम लोगों के) घरों में ऐसा ही कोई एक दिन व्यतित होता होगा।

    पढते हुये मुझे ऐसा लगा कि मैं भी वहीं कहीं ही था आसपास, और यह सब होते हुये देख रहा था।

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