मंगलवार, 31 मार्च 2009

लम्हें

लम्हें

जिन लम्हों में, राजहंस आकांक्षाओं के
मनसागर में, पंख खोले इठलाते हैं
लहराते हैं, तिर जाते हैं कितनी दूर तलक।
जिन लम्हों में भीषण पर्वत को
तोड़-तोड़ धाराएँ, कि जाने किस ख्याल से
होकर, बेखौफ, चली आती हैं
मदमाती हैं बढ़ जाती हैं
छल छल करके।
जिन लम्हों में, भीतर हरहराने पर
जब्त हुए शब्दों को भी
कह देते स्पर्शोन्मुख अधराधर
चुपचाप पढ़ा करते हैं सिहरन की
भाषा को औऱ मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
जिन लम्हों में काया की दीवारें
अंतर की मधुर वेदना में
अपने को खोकर हर्षाती
और सिमट-सिहर ढह जाती हैं।
जिन लम्हों में, भंवरे कलियों की परत-परत
को खोल-खोल बेसुध सौरभ से सने हुए
आते है, जाते हैं
औऱ बार-बार मुस्काते हैं, गाते हैं।
जिन लम्हों में, कोयल, चातक, चकोर
अपने प्रियतम को टेर टेर थक जाते हैं
फिर भी युग युग से प्रीति निभाए जाते हैं
उन दिव्य अलौकिक और चिरन्तन लम्हों को मेरा प्रणाम
जिनके रहस्यमय मादक, मोहक उदभावन को
कोई भी नहीं समझ पाया, लगता है ये चिर-परिचित हैं
लगता है नितान्त
अपरिचित हैं।

हमारा बचपन नाम का ब्लॉग बनाकर मन ने चाहा था कि मैं बचपन के लम्हों को बार बार जीयूं. और इसलिए ही मैं प्रयास रत्न हूं। बचपन की डायरी को पलट रही थी और मुझे एक कविता दिखी जो मुझे उस समय बहुत पसंद आती थी। कविता का भाव पता नहीं मैं उस समय समझ भी पाती थी कि नहीं पर मुझे यह कविता अच्छी जरुर लगती थी। लेखक से मैं अपरिचित हूं क्योंकि यह कविता मेरी फुफेरी बहन ने मेरी डायरी में लिखी थी। शायद यह उसकी ही लिखी कविता हो।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बेहतरीन लिखते हैं आप ...आपका और आपके ब्लॉग का स्वागत है

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  2. बहुत ही भावपूर्ण रचना है.
    आगे भी ऐसी ही रचनाएं लिखती रहें
    मेरी शुभकामनाएं

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