मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

हमारा बचपन

मैं और मेरे पति अक्सर फुरसत के पलों में अपने बचपन की घटनाओं को याद करते कभी रोमांच से सिहर जाते हैं, तो कभी रुआंसा। मैने अपने से इतर भी कई बार महसुस किया है कि लोग अपनी बचपन की घटना सुनाते वक्त कितने उत्साहित हो जाते है अगर कुछ दुखद घटा हो तो थोड़ी देर के लिए दुखित भी हो जाते हैं. मतलब कि हम सब अपने बचपन को अपने यादों की एलबम में सजोए, दिल से लगाए रहते हैं. फुरसत में यादों के पलों को सांझा करने के रोमांच में कई बार घटनाओं को इतने बढ़ा चढा कर बोलते हैं कि सुनने वाला भी अपने हिसाब से ही उस घटना को रिसीव करता है. फेंकी हुई बातें खुद ही छांट लेता है. पर किस्से सुनने- सुनाने में मजेदार होते है। बस इसी आइडिया को लेकर लेकर हमारा बचपन नामक यह बच्चा ब्लाग आपके सामने हाजिर है। जो हर वक्त आपके सामने बच्चा ही रहेगा। ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. bachpan ko yad karne ka ek alag hi maja hain . aaj ki jindagi men aaj aur kal ke sapno mein hum apne bacpan ki yadon ko to bhula hi baithe hain. aaj tumhara blog padh kar kutch yaden ubahar aayen. hum bahut chote they ,rhymes sunane wala umar tha. ghar main koi aaye to wahi beta twinkle-twinkle bolo. aisa aksar hoto tha.ek din ghar mein papa ke friends aaye hua they jo english hi bolte they. shayad 4 yr ki umar rahi hogi meri. cobbler-cobbler mend my shoes... rhyme humne uneh sunaya tha lakin humen cobbler ka meaning nahi pata tha to us wakt mujhe jo kharab sa laga tha ye aaj bhi main feel karti hun. aur aisa manti hun ki kabhi bhi bachoen ki lgpulling nahe karne chahiye.

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  2. इंतजार रहेगा आपलोगों के बचपन को जानने का ...

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