बुधवार, 6 मई 2009

आज वर्ल्ड नो डाइट डे है

आज वर्ल्ड नो डाइट डे है

यह वाक्य पढ़ कर हम भारतीय के चेहरों पर अजीब सी हंसी बिखर जाती है। भारत की जनता यह डे रोज ही मनाने की आदि है। और भारत जैसे देशों के लिए यह दिन मनाना गैर जरुरी है ऐसा हम सभी मानते है।

-जब जीरो दिया मेरे भारत ने- गीत की यह पंक्ति आज भी मुझे उतना ही रोमांचित करती है जितना मेरे बचपन में मुझे किया करती थी क्योंकि बचपन में ही आप देश भक्ति की भावना को महसूस कर सकते हैं बाद में तो हम सरकार
की नाकामियां गिनाने और अपने देश पर शर्मिन्दा होना सीख जाते हैं.

हां तो यह पंक्ति मुझे इसलिए याद आई क्योंकि हमारा देश चाहे गरीब रहा हो पर समृद्ध घरों में भी उपवास का बहुत महत्व था और आज भी है। लोग मजाक में कहते हैं कि भारत में तो 365 दिन पर्व ही मनाया जाता है तो मैं अब सोच
रही हूं कि हमारे पूर्वज पहले से ही इतने भविष्यवक्ता थे कि वह गरीब और धनवानों के लिए अलग अलग कायदे कानून बना रखे थे। वे जानते थे कि गरीब व्यक्ति को चूकि रोटी पाने के लिए हाड़ तोड़ कोशिश करनी पड़ेगी सो उन्हें उपवास की महता बताने की जरुरत नहीं थी। पर कुछ प्रतिशत खाते पीते लोग जो ज्यादा ही खा लेते हैं भोजन की सुगम उपलब्धता के कारण तो उनके लिए और उसमें खास कर उन घरों की महिलाओं के लिए जो घर पर ही रहती थी, उनके लिए उपवास नियम बनाया गया। चूकि समृद्ध लोग नियम माने इसलिए उनलोगों ने हम महिलाओं से इमोशनल अत्याचार भी किया। पति के नाम पर, बच्चों के नाम पर और सूर्य के नाम पर कठिन व्रत का नियम बना दिया।

संसार, जिसमें कई देश अफरात अमीर है तो कई देश गरीब अपने अपने सुविधा के अनुसार यह डे मना सकते हैं। भूखों को मनाने की जरुरत नहीं और समृद्ध मनाने से रहे। मेरे बडे चाचा जो पेशे से सरकारी डॉक्टर हैं वह हर रविवार को अपने घर की
सारी घडि़यां बंद रखते है। शायद वह जानते हैं कि शरीर को जैसे आराम की जरुरत होती है वैसे ही मशीन को भी होती होगी। यह उनकी सोच है, पर हम भारतिय जब हमारी रोजमर्रार की चीजों को लेकर इतने संवेदनशील है तो शरीर को लेकर तो हम रहेंगे ही। शरीर से ही दूनिया हमें सुंदर दिखेगी। इसतरह मेरे पापा हर रविवार को रात का खाना एवायड़ करते हैं। और पूरे दिन के उपवास से दूर भागते है।

मैं सोच रही थी पश्चमी देश अब कितना बदल रहा है जो भारत को सांपो और तमाशो का देश समझता आ रहा था वह अब भारत की संस्कृति को चाहे प्रयोगशाला में जांच कर धीरे धीरे मानने लगा हो चाहे जैसे भी हो। वहां डॉटरस डे, हसबेंड डे, फादरस डे, आदि ना जाने कौन कौन सा दिन मनाने का प्रचलन शुरु हो रहा है। वे लोग भी अब भारतियों की तरह परिवारवाद के महत्व को समझ रहें है। रिश्तों के टूटन एक गंभीर दूर्घटना है। शारीरिक टूट तो ठीक हो जाती है पर रिश्ते जब कमजोर पड़ जाते हैं तो असुरक्षा की भावना जग जाती है जो किसी को भी दबोच सकती है और वह किसी भी पल डिप्रेशन का शिकार हो जाता है।

हमारे यहां डिप्रेशन नाम का कोई शब्द नहीं था। लोग परिवारों में रहते हैं चाहे वह पेशेवश दूर शहर में रहें पर रिश्तों की गर्माहट से हमेशा जुड़े होते हैं। आज भी परिवार में एक व्यक्ति का दर्द दूसरा महसूस कर पाता है। जैसे पश्चिमी देश हमारा अनुशरण धीरे धीरे कर रहा है वैसे ही हमारी पीढ़ी भी विकसित देशों का अनुशरण कर रही है औऱ वहीं दिक्कतों का सामना कर रही है जो वे लोग वहां कर रहे हैं और साल में एक दिन नो ड़ाइट डे मनाने को प्रतिबद्ध हैं। भारतियों की इस पीढी और अगले आनेवाली पीढ़ी को यह समझना चाहिए कि हम अपनी चीज को खोकर फिर से सीखनेवाली स्थीति में ना आ जाऐं।

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अनूठा शीर्षक है, बस खिंचे चले आये

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    चाँद, बादल और शाम

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  2. इस पोस्ट की सबसे अच्छी बात -
    "हमारे यहाँ डिप्रेशन नाम का कोई शब्द नहीं था!"

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