मंगलवार, 26 मई 2009

वट सावित्री की पूजा


आज वट सावित्री की पूजा थी। उत्तर बिहार के मिथिला और कोशी अंचल का प्रसिद्ध वट वृक्ष पूजा यानी वट सावित्री पूजा पूरे देश में मनाया गया। भारत के कुछ हिस्सों में बरगद पेड़ की पूजा होती है। बड़ा ही मजेदार पूजा होती है। बरगद की पूजा महिलाऐं अधिकतर करती है। इस दौरान पेड़ में जल डाला जाता है, दीया -बत्ती दिखाकर फूल चढाया जाता है। पेड़ के चारों तरफ अल्पना भी बनाते है। पूजा खत्म होने के बाद पेड़ की परिक्रमा की जाती है। पेड़ को धागे से लपेटा जाता है चंदन सिंदूर का लेप लगाया जाता है। औऱ सब से अंत में पेड़ से गले मिल कर उसके तने को दबाया भी जाता है।

मैं पूजा में विश्वास नहीं करती हूं और चूकि मायके में हूं तो सब का कहना मानना जरुरी भी है। और कल जब मैं दीदी को पूजा की अनिच्छा दिखाई तो उसने बड़ा सही कहा कि हमलोग को ही विरासत में अपने संस्कार कम मिला है और अगर हम यह भी नहीं करे तो आने वाले पीढी को क्या देंगे। मुझे यह बात जच गई और मैं सुबह नहा धोकर वट की पूजा करने पहुंच गई। चूकि फ्लैट में रहने और शरीर में आलस भरा होने के कारण हमलोग वट पेड के पास ना जाकर छत पर ही रखे गमले में लगे वट के डाल से पूजा कर लिये। पूजा भली भांती संपन्न हो गया जिसमें हर औरत पांच पत्तों को सजाकर प्रसाद चढाई औऱ एक पत्ते अपने सर के जूडे में खोस ली। सुंदर अति सुंदर लगा पत्ते को जूडे पर लगाना।

मुझे याद है मैं जब छोटी थी तो मां यह पूजा समुह में कर घर लोटती थी तो मां के नाक से लगे सिर तक में सिंदूर लगा होता था। और प्रसाद के रुप में पहली बार आम के सीजन में आम चखने को हमें मिलता था। औऱ उसके बाद से आम बाजार में आ जाता था।

आज समाज का विभत्स रुप देखने को मिलता है। महिलायें पेड़ के पास ना जाकर पेड़ को घर बुला लेती है। पूजा की कथा में लिखा है कि अगर वट पेड़ ना मिले तो टहनी भी चलेगी या फिर दिवार पर बनाया हुआ बरगद का चित्र से भी काम चल सकता है। पर जो हो टहनी से पूजा करना मुझे रास नहीं आया। और पत्तो को तोड़ना मेरे लिए नागवार है। हम हर वक्त विकास की बात करते है और बरगद का टहनी भी विकास का ही सूचक है पर सारा पूजा पाठ तब यूं ही बेकार हो जाता है जब ब्राहमणो द्वारा बनाया गया नियम सिर्फ यजमान को सुविधा प्रदान करता है. अगर यजमान पेड़ के पास ना जा सके तो पेड को घर ले आना कहीं से भी प्रगतिशिलता नहीं माना जाना चाहिए। पर्यावरण के साथ यूं खेल सिर्फ यजमान को सुविधा देने के लिए यह कहीं से ठीक नहीं है। और यूं ही अगर अभी भी हम यह नहीं चेते तो वह दिन भी आ जाएगा जब बरगद का चित्र दिवार पर या कपड़े पर बनाकर हमें उसकी पूजा करनी होगी।

बरगद सूचक है हमारे समाज में मजबूती का। मतलब जो मजबूत है आदरणीय है। कमजोर की पूजा नहीं होती। संस्कार में हमें यह तो नहीं बताया गया था कि पेड़ की टहनी को ही घर ले आओ। पर हम बदल रहे है हर कुछ अपने सुविधानुसार करने की कोशिश में हम पेड़ को बुरी तरह नुकसान पहु्चा रहें है। है। हम लोग भटके हुए है। पेड़ का नुकसाम कर हम खुद का नुकसान कर रहें है। औऱ सोचते हैं कि हम अपनी संसकती को बचाये हुए है। पेड से अपनत्व का संबध बनाना आज बहुत मुश्किल होता जा रहा है। समय की कमी औऱ ढेरों काम के बोझ तले दबे होने के कारण हम स्वार्थी होते जा रहें है कि हमें खुद प्रक़ती से खेलने में मजा आता है और खुद को संस्क़ती से जुड़े होने का ढोंग करने में मजा आता है।

बरदग के पूजा की सोच बहुत ही दिलचस्प रही होगी । जिस तरह प्रक़ती में पेड़ के बिना काम नहीं चल सकता ठीक उसी तरह घर में पति के बिना काम नहीं चल सकता। दोनो को खुश रखना औऱ प्यार, सम्मान देना जरुरी है। तो पूजा में बरगद को चढाया हुआ जल लाकर पति के पांव धोये जाते हैं उसे मिठाई और प्रसाद दी जाती है। इस पूजा की सोच बहुत अच्छी है उस वक्त पति से प्यार का इजहार भी अनोखा था। पेड़ को मजबूत औऱ रच्छक के रुप में देखा जाता था और पति भी उसा का पर्याय होता था। पर इजहार सीधा ना कर के दोनो को एक सुत्र में बांधा जाता था। यह एक मूक इजहार था पति औऱ पत्नी के बीच के संबध को प्रगाढ़ करने का जहां दुनियां का कोई भी आरचीज का कार्ड डिजाइनर इस प्यार को आलेखित नहीं कर सकता।

4 टिप्‍पणियां:

  1. वट सावित्री पूजा पर यह विशद चर्चा अच्छा लगा साथ में आपका प्रकृति प्रेम भी। मुझे तो यही लगता है कि आपका जुड़ाव मिथिला से है क्योंकि यह पर्व मिथिला में इसी तरह से मनाया जाता है।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.

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  2. वट पुजा का बहुत रोचक विश्लेशण किया आपने.. धन्यवाद..

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  3. वैसे यह त्योहार पति की लंबी आयु के लिये किया जाता है और इसके पीछे सावित्री सत्यवान की कथा बताई जाती है।

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