बुधवार, 29 अप्रैल 2009

ट्रैफिक जाम अब मुझे लुभाता नहीं

हमारा बचपन

"टैफिक में फंसा युवा भारत"

बचपन की यादों को जितना मैं सहेजना चाहती हूं, वह मुट्ठी में बंद रेत की तरह है जिसे मैं जितना ही जकड़ कर पकड़ने की कोशिश करती हूं वह उतनी ही तेजी से सरसराता हुआ मेरी मुटठी से निकल जाता है, और मेरा हाथ खाली का खाली ही रह जाता है।

पर फिर भी मैं अपनी कोशिश को आगे बढाऊंगी और अपने दिनों को आज के संदर्भ में याद करुंगी।
जन्म जमशेदपुर में होने के कारण हमलोगों ने कभी ट्रैफिक जाम को महसुस नहीं किया था। वह शहर इतना व्यवस्थित है। वहां के लोगों को इस महा मुसीबत का सामना आज भी नहीं करना पड़ता है। कारण शहर की अच्छी यातायात व्यवस्था तो है ही और दूसरा मुख्य कारण मुझे वहां कारखानों में होने वाला शिफ्ट ड्युटी भी लगता है। शिफ्ट ड्युटी के कारण टुकड़ों में लोग काम पर निकलते हैं और सामान्य ड्युटी वाले दस से पांच वाली अपनी शिफ्ट मजे से पूरी करते हैं। इस तरह कम चौड़ी (दिल्ली की तुलना में संकरी) सड़कें भी स्कूल, आफिस या फिर कारखानों में आने-जाने वालों के लिए हमेशा साफ और खुली रहती है। हर समय नियंत्रित ट्रैफिक।

अपनी शादी के बाद जब मुझे दिल्ली होते हुए पंजाब जाना पड़ता था तो दिल्ली स्टेशन की रोशनी मुझे चकाचौध करती थी। ट्रेन से ही जब लम्बा जाम देखती तो कारों की संख्या पर विश्वास नहीं होता था। लगता था शायद यही स्वर्ग है। रात की रोशनी में सभी गाड़ियां मुझे सफेद ही दिखती थी। और मैं यही सोचा करती थी कि क्या मेरे पास भी कभी गाड़ी होगी और मैं भी यूं ही लम्बे लाइन का इंतजार कर पाऊंगी। मुझे ट्रेन से जाते या आते वक्त दिल्ली की रंगरलियां ही सिर्फ दिखती थी। दूर दूर तक बल्ब का टिमटिमाना मुझे बहुत आकर्षित करता था। पर मैं यहां रहने का कभी सपना नहीं देखती थी लेकिन मुझे ट्रैफिक में फंसना रोमांचित करता था उस वक्त।

अब स्थिति बिल्कुल अलग है। मैं भी अब महानगर का हिस्सा हूं। रोशनी चकाचौध तो करती है और आकर्षित भी करती है पर मोह नहीं पाती। अब मजबूरी है तो उस जाम का हिस्सा मैं भी कभी कभी बन जाती हूं। बस में मैं बैठ बाहर टकटकी बांध देखती हूं जीवन की सच्चाई को जो अब मोहित नहीं करता। सिर्फ आगे बढ़ने की अंधी दौड़ को कायम रखने की जुगत ही मुझे जाम में फंसा देता है। महानगर की सच्चाई से जो जूझते हैं वह थक हार कर घर लौटते हैं और फिर ना जाने अगले दिन के लिए उर्जा कहां से ले आते हैं फिर से उस ट्रैफिक जाम से लड़ने का।

शादी हो या कोई पर्व फिर तो जाम की कोई बिसात नहीं। जाम में फंसा व्यक्ति सब को फोन पर ही बताता रहता है कि वह अब कितने देर में पहुंचेगा। पर मजे की बात यह भी है कि लोग जाम का बहाना भी खूब बनाते हैं। बस में खूब सुनने को मिल जाता है कि अरे यार, थोड़ी देर मेरा और वेट कर लो मैं बस पहुंचने ही वाला हूं, क्या करुं जाम में फंसा हूं। बहुत अच्छा बहाना है। फिर अगला भी कुछ नहीं कहता, ज्यादा जानकार व्यक्ति उसे दूसरा रास्ता समझाने की कोशिश करने लगेगा। ट्रैफिक सिग्नल पिक्चर देखने के बाद कुछ जाम में फंस कर अपने आमने सामने भीख मांगते लोगों को शक की निगाह से देखने लगते हैं। और उनका पिक्चराइजेशन भी करने लगते हैं कि फलाना बच्चा तो यूं ही दिखता था और ऐसे ही चीजें बेचता या भीख मांगता था।

जाम की त्रासदी उसमें फंसे लोग ही बता सकते हैं जो घर जल्द जल्द से लौटना चाहते हों और किसी वजह से जाम का हिस्सा हो गए हों। जाम में बिताया गया समय और ऊर्जा का ह्रास देश की बहुत बड़ी समस्या है। सरकार के पास बहुत बड़े बड़े एजंडे है। कई फ्लाईओवर बना चुकी है कई बना रही है पर जाम बदस्तूर जारी है।
जाम से राहत के कई तरीके लोग अपनाते हैं पर अगर सब मिल कर इसका समाधान खोजें तो शायद हम जाम रुपी महाकाल से बच पाएंगे।
मैं उन सारे लोगों को नमन पहले करना चाहुंगी वह जिस वजह से भी हों पर पब्लिक ट्रांसर्पोट इस्तेमाल करते हैं। कितनी दिक्कतों का सामना उन्हें करना पड़ता है। इसे मजबूरी का नाम गांधीजी नहीं समझना चाहिए।
सरकार को भी चाहिए कि वह पब्लिक ट्रांसर्पोट को ज्यादा से ज्यादा बेहतर बनाए। एसी बसों की संख्या भी उतनी ही ज्यादा हो ताकि लोग अपने कारों को घर पर छोड़ प्राइवेट बस का सफर करने में सकुचाए नहीं। बहुत सारे परेशानियों का हल यूं ही निकल जाएगा जब लोग अपने गाडियों का इस्तेमाल बहुत कम करना शुरू कर देंगे।
बस दुआ कीजिए कि अगली बार जब भी हम जाम में फंसे तो यह सोचने पर मजबूर हों कि क्या इससे बचा नहीं जा सकता है। हमारी युवा शक्ति यूं ही जाम में खड़े खड़े बूढ़ी हो जाएगी और हम सिर्फ युवा भारत होने का ढ़ोग करते रह जाऐंगे।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

RESERVE CONSUMPTION

यह मेल मुझे मेरे पापा ने भेजा है। मैं अपने बचपन की यादों को सहेजते हुए यह बताना चाहुंगी कि चुकि मेरे पापा अभी टिसको के रिसर्च डिपार्टमेंट में डी.एम के पदभार को संभाले हुए है और एनर्जी कनसर्वेशन को लेकर हमेशा विचार मग्न रहते हैं. बचपन से वे हमे समझाते आ रहे हैं कि किस किस तरह से हमसब एनर्जी को बचाते हुए आने वाले जनरेशन को कुछ दे पाऐंगे अन्यथा हमारे हाथ अपने बच्चों को देने के लिए घर, पैसा, ऐशोआराम तो होगा पर दुषित पानी, जहरीली हवा, औऱ रासायनिक तत्वों से भरा खाद्य पदार्थ उन्हें देने के लिए हम बाध्य होंगे।

तो वे सारे लोग जो इस पोस्ट को पढ़े हों और हमारी इस कोशिश में सहयोग करने की इच्छा रखते हों तो अपना सुझाव जरुर दीजिए कि कैसे हम लोग सामानो को रिसाइकिलिंग कर, कुछ हद तक ग्लोबल वार्मिंग को बचा सकते हैं। और भी उपाय जो सहज ढंग से हम कर सकते हैं सिर्फ अपनी इच्छा शक्ति के दम पर।
आभार पुनीता


RESERVE CONSUMPTION


Buddha, one day, was in deep thought about the worldly activities and the ways of instilling goodness in human beings. One of his disciples approached him and said humbly "Oh my teacher! While you are so much concerned about the world and others, why don't you look in to the welfare and needs of your own disciples also?"

Buddha : "OK.. Tell me how I can help you"

Disciple : "Master! My attire is worn out and is beyond the decency to wear the same. Can I get a new one, please?"

Buddha found the robe indeed was in a bad condition and needed replacement. He asked the store keeper to give the disciple a new robe to wear on. The disciple thanked Buddha and retired to his room. A while later; he went to his disciple's place and asked him "Is your new attire comfortable? Do you need anything more?”

Disciple : "Thank you my Master. The attire is indeed very comfortable. I need nothing more"

Buddha : "Having got the new one, what did you do with your old attire?"

Disciple : "I am using it as my bed spread"

Buddha : "Then.. hope you have disposed off your old bed spread"

Disciple : " No.. no.. master. I am using my old bedspread as my window curtain"

Buddha : " What about your old Curtain?"

Disciple : "Being used to handle hot utensils in the kitchen"

Buddha : "Oh.. I see.. Can you tell me what did they do with the old cloth they used in Kitchen"

Disciple : "They are being used to wash the floor."

Buddha : " Then, the old rug being used to wash the floor...?"



Disciple: "Master, since they were torn off so much, we could not find any better use, but to use as a twig in the oil lamp, which is right now lit in your study room."

Buddha smiled in contentment and left for his room.

If not to this degree of utilization, can we at least attempt to find the best use of all our resources at home and in office? We need to handle wisely, all the resources earth has bestowed us with ….both natural and material so that they can be saved for the generations to come. Reserve Consumption !!!

आभार
पुनीता

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

आम तो खट्टे हैं, पर मन है उचाट


गर्मी के दिनों की शुरुआत हो रही है औऱ आम के पेड़ में लगे मंजर छोटे छोटे आम बन रहे होंगे। मैं उम्मीद कर रही हूं कि आम आधी इंच के हो गए होगे। आम का पेड़ औऱ उसमें लगे आम काफी आकर्षित करते हैं राहगीर को। मैं जब अपने स्कूल से वापस आया करती थी तो (जमशेदपूर की रहने वाली हूं) तो टीसी क्लॉनी के क्वाटर में एक कोने के घर पर आम का पेड़ लगा था और उसके छिलके लाल रंग के थे। स्कूल आते और जाते वक्त पेड़ को देखना नहीं भूलती औऱ मन ही मन सोचती कि उसमें रहने वाले आदमी कितने बड़े लोग होंगे।

पता नहीं उस घर से तो मुझे कोई दिखा कि नहीं पर आज भी वह पेड़ मुझे याद आता है।

जमशेदपुर टाटा स्टील द्नारा बनाया गया एक व्यवस्थित शहर है। जहां उसके कर्मचारी को घर भी रहने को दिया जाता है और सभी घर के बगान मे कोई ना कोई पेड़ हैं। सड़कों के दोनो ओर तो पेड़ों की कतार है। विदेशी पेड़ नहीं दिखते। खास देशी पेड़ अपने में जंगलीपन लिए उगता है। अधिकतर फलदार, छायादार पेड़ होते हैं। अजीब सी खूबसुरती दिखती है। जब आमने सामने क्वाटर पेड़ों की कतार और फिर चौड़ी सड़क हो तो।
स्कूल से आते जाते या कभी भी घर से निकलते थे तो सब के घर के आम का पेड़ ही दिखता था। और आपस के बातचीत में भी यह बात उठती थी कि फलाना के घर इसबार खूब मंजर लगा है, और फलाना के घर उससे कम। मंजर की याद आते ही याद आता हैं कि कैसे पहली बारिश में आम के मंजर को अपनी पहली परीक्षा देनी पड़ती थी। मौसम तो सुहाना हो जाता था पर रोड़ पूरे मंजर से भर जाता था। सुबह जमादार (सफाई कर्मी) की शामत आता होगी। सरवाइवल फॉर द फिटेस्ट वाली बात होती मंजरो में भी। फिर कुल मिलाकर हजार हजार मंजर में बमुशि्कल दस पोपले लगते थे।
आम के आकार का बढ़ना हम पेड़ से कम अपने सहेलियों द्वारा स्कूल में लाए जाने से ज्यादा जान जाते थे कि अब आम इतना बड़ा हो गया है।
स्कूल में जो सबसे बड़े आकार का आम लाती उसकी इज्जत थोड़ी बढ़ जाती थी। और सभी उसे ललचाई दृष्टि से देखते। पर वह किसी को कुछ नहीं देती। हमारा बचपन प्रेमचंद्र के बचपन की तरह नहीं था इसलिए गांव की बात तो पूरी तरह नहीं होती पर शहर और गांव के मिला जुला रुप से हमारा बचपन गुजरा है। इसलिए ना पूरी तरह गांव की हो पाई और ना ही शहर की उस आबादी की तरह जो अपने बारे में ही सिर्फ सोचते हैं।

और तो थोड़ी भटकन के बाद फिर से मैं अपने बचपन में आती हूं कि स्कूल में सबसे बडे आकार के आम लाने पर वह लड़की कितनी अपने को महान समझती थी जैसे कि पूरी जन्नत उसकी हो। घर में पापा कच्चे आम देख कर ही गुस्सा हो जाते थे। शायद ही कभी अचार खाए हों। इसलिए कच्चा आम की इच्छा बढ़ती ही जा रही थी।
भरी दोपहर जब घर पर सब सोते तो मैं अपने घर के छत मतलब क्वाटर का छत जो ग्रिल के सहारे से चढ़ती और आम के पेड़ के छांव में बैठ जाती।
हमारे बगल के क्वाटर में खोकन चाचा लोग रहते थे। बंगाली परिवार था और काफी लोग थे उस घर में इसलिए उनके आम के पेड़ की रखवाली करना कोई मुशि्कल बात नहीं थी पर मैं तो छत पर चढ़ कर आम तोड़ती पर फिर भी मेरी सहेलियों से मेरे आम का साइज कम ही रहता था। काफी गर्मी के बाद अगर बारिश हो गई तो आनंद की पराकाष्ठा होती मेरी। मैं मां से छुप कर आम चुनने निकलती। सब के घर के सामने नाली होता है वहां पर और वह बारिश के पानी के लिए ही बना होता है, औऱ सभी वक्त सुखा ही होता है जो हमारे चोर पुलिस खेलते वक्त छुपने की जगह हुआ करता था । बारिश के दिनों में पानी
भर जाता और कोई आम अगर उसमें जा गिरा होता तो बहुत अफसोस होता। मेरे घर से और कोई नही निकलता मेरी दीदी को तो मार पड़ती थी कि घर पर क्यों घुसी रहती हो आज वह स्कूल की प्रिंसिपल है औऱ मुझे मार पड़ती थी कि तुम इतने देर तक क्यों खेलती रहती हो। मुझे खेल में भीबहुत प्राइज मिलता था। बचपन में बिताए क्वाटर में बारह साल बिताने के बाद हमें जबरदस्ती बड़े क्वाटर में जाना पड़ा। हमारे इस क्वाटर में अमरुद तीन पेड़ थे। घर के सामने बगान में दो और पीछे आंगन में एक। एक पेड़ में काफी अमरुद लदा होता था और दुसरे में काफी कम पर बहुत टेस्टी। पीछे आंगन के पेड़ पर चढ़ना संभव था इसलिए मैं अपना काफी समय उसपर गुजारती थी। मुझे तो हर एक आमरुद का पता होता कि हरदिन वह कितना बढ़ रहा है। मैं तो कई बार मुंह से काट कर डाल पर ही लटके रहने देती कि इसे तीन या चार दिन बाद तोड़ा जा सकता है।
यह सारी बात लिखने की इच्छा इसलिए बलवत हुई कि मैं संडे मार्केट में कच्चा आम देखी। बहुत महंगे थे फिर भी मैने खरीदा क्योंकि उसका साइज मेरे बचपन के दिनों की याद से बहुत बड़ा था। मैं आज भी अपने उन सहेलियों के लाये गए बड़े साइज के आम से अपने को कम मानती हूं कि मेरे पास वह नहीं है। और शायद इसलिए मैं हर गर्मी के मौसम में सबसे पहले कच्चे आम खरीदती हूं। अब मुझे खाने की बहुत इच्छा नहीं होती उस वक्त भी नहीं होती थी पर एक जिद।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

हमारा बचपन

मैं और मेरे पति अक्सर फुरसत के पलों में अपने बचपन की घटनाओं को याद करते कभी रोमांच से सिहर जाते हैं, तो कभी रुआंसा। मैने अपने से इतर भी कई बार महसुस किया है कि लोग अपनी बचपन की घटना सुनाते वक्त कितने उत्साहित हो जाते है अगर कुछ दुखद घटा हो तो थोड़ी देर के लिए दुखित भी हो जाते हैं. मतलब कि हम सब अपने बचपन को अपने यादों की एलबम में सजोए, दिल से लगाए रहते हैं. फुरसत में यादों के पलों को सांझा करने के रोमांच में कई बार घटनाओं को इतने बढ़ा चढा कर बोलते हैं कि सुनने वाला भी अपने हिसाब से ही उस घटना को रिसीव करता है. फेंकी हुई बातें खुद ही छांट लेता है. पर किस्से सुनने- सुनाने में मजेदार होते है। बस इसी आइडिया को लेकर लेकर हमारा बचपन नामक यह बच्चा ब्लाग आपके सामने हाजिर है। जो हर वक्त आपके सामने बच्चा ही रहेगा। ।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

बदलती लड़कियां

समय बदला और समय की मांग बदल रही है। आज का पवित्र दिन उन कन्याओं के नाम होता जा रहा है और उनके भाव बढ़ते चले जा रहे हैं। मेरे बचपन में ऐसा कुछ भी नहीं होता था। कन्या पूजा को याद करुं तो मुझे एक बार की गई पूजा याद आती है। पता नहीं मैं कितने साल की थी पर एक मेम साहब जैसे परिवार में हमलोगों को निमंत्रण मिला। हमसारे बच्चे उनके घर पधारे। अभी मुझे याद नहीं आता वह अंकल कहां काम करते थे पर उनके घर में बहुत सारे अच्छे अच्छे सामान थे। पहली बार सफेद सोफे पर बैठी थी तो ऐसा लगा था मानो हमलोगो अंदर ही घुस गए हैं। गेंद ढुंढते हुए मुझे याद हैं जब पलंग के नीचे झांकी थी तो बड़े बड़े लेदर के बक्शे थे जो बाद में पापा के फोरन ट्रिप से हमारे घर में भी आ गए थे। वह आंटी भी बहुत सुंदर याद नहीं पर लम्बी सी औऱ गोरी सी थी। इस सारे यादों के बीच में मुझे याद आता है कि कंजके का चलन उस वक्त इतना नहीं था और मुझे वापसी में एक रुपये के सिक्के मिले थे। बहुत आश्चर्यजनक घटना थी उन दिनों हमारे लिए। पर मैं तो एक औरत के मेरे पांव पूजने से तर गई थी। औऱ मुझे पूरे जीवन उस घटना की झलक याद है। औऱ यह भी याद है कि वह हमलोग को दोपहर के वक्त ही बुलाई थी। पर उनके घर के सामान देख कर पिक्चर में देखे गए सामान याद आ जाते थे। मेरे रोड़ में ही रहती थी। इसलिए जब भी उनके घर के सामने से गुजरना होता तो उनके घर के तरफ देखते हुए जाती मानो कोई अनोखा दृश्य दिख जाए।

आज समय बदल गया है। कल मेरी पड़ोसन ने जब श्रुति से कहा कि बेटा सुबह आठ बजे आ जाना तो उसका जवाब था - आंटी किसी को भेज देना। मुझे यह जवाब सुनकर तृप्ति मिली इसलिए कि वह अपनी अहमियत जानती-समझती है। अच्छी बात है।
सुबह से ही घूम रही है पर वहीं जहाँ उसे बुलाया जाता है। अब घर पर आ कर दक्षिणा में मिले पैसे की गिनती कर रही है। कुल 25 रुपये हो गए हैं। मेरे समय से बहुत ज्यादा है। मै ऐसे ही तुलना कर रही हूं। मजा आ रहा है उसकी सारी हरकतों के देखकर। पैसे लेना और फिर उसकी खर्च करने के प्लान यह सब दिलचस्प हैं। आज की कन्या भीरु नहीं है वह जानती है उसे क्या करना हैं। मुझे याद है जब वह छोटी थी तो मेरे बिना कहीं किसी के घर कन्या पूजा को नहीं जाती थी। पर अब मुझे उसे रोकना पड़ता है तो लोग घर से उठा कर ले जाते हैं। मुझे उसके द्वारा लाया गया प्रसाद अच्छा नहीं लगता। मैं उसे वहीं खा लेने को कहती हूं । पर वह नहीं मानती ले कर ही आती है।

बदलते समय में बदलती लड़कियों के तेवर देख मुझे अच्छा लगता है। आज के दिन कन्या की पूजा कर समाज अपने के शायद यह दिलासा देता है कि मेरे घर चाहे लड़की ना हो पर हम अड़ोस पड़ोस की लड़कियों की खूब इज्जत करते हैं। हम उन्हें पूजते हैं। हम उन्हें शकि्त का दर्जा देते हैं।
पर ऐसा नहीं है। यह आंकड़े ही बता सकते हैं कि लड़कियां अपने आस पड़ोस में ही कितनी सुरक्षित है। घर में उनकी कितनी इज्जत है। क्या वह लड़के की बराबरी आज भी कर रही है शायद एक ही स्कूल में बेटे औऱ बेटियों को पढ़ाने के बावजूद एक मां बाप की कसक मन में रह जाती है कि कन्या समाज में शकि्त हो सकती है, दुर्गा हो सकती है, सरस्वती भी हो सकती है पर घर में वह सिर्फ और सिर्फ ऐसी लड़की है जो परायी धन है उसे कुछ दिन ही इस घर रहना है और फिर अपने घर चले जाना है।