गुरुवार, 21 मई 2009

हम और मैं के बीच का फासला

दो शब्द हम और मैं- अर्थ एक। यह दो शब्द सभी कोई अपने को अभिव्यक्त करने के लिए अक्सर करते हैं. व्याकरण की बात ना करें तो खुद को अभिव्यक्त करने के लिए मैं बचपन से पिछले दो साल तक हम शब्द का प्रयोग ही करती थी। औऱ मुझे यह अच्छा लगता था। कोई अगर मैं कहता तो मुझे लगता यह क्यों मैं मिया रहा है। प्राय ऐसा होता कि लोग जब अपने शहर को छोड़ दूसरे शहर से आते तो मैं मियाते दिखते।
कई बार लोगों से बहस हो जाती है, हम औऱ मैं शब्दों के बीच। प्रायः सभी हम शब्द से प्यार करते थे पर दूसरे शहर की आवोहवा के अनुसार ढलने के लिए अपने को मौडरेट करते हुए मैं पर उतर आते है। और फिर वही अच्छा लगने लगता। बहस के दौरान बात उठती कि हम शब्द से हम अपने को पूरी तरह अभिव्यक्त तो कर पाते ही है और साथ साथ ऐसा भी लगता है कि मेरे साथ और भी कोई खड़ा है मेरे तरफ से। हम शब्द से एक समुह का आभास होता है जो साथ साथ है मेरे पर मैं बहुत एकाकी है। बिल्कुल अकेला। पर मजबूत। सख्त स्तंभ की तरह। कोई हिला डुला नहीं सकता।
यह भी एक फर्क है ऐसा मैं मानती हूं एक शाकाहारी और मांसाहारी व्यक्ति की सोच जैसा। जिस तरह मांस खाने से बुद्धि की गती दूसरी होती है और नहीं खाने से दूसरी। जिस तरह खानपान हमारे व्यक्तित्व को दिखाता है ठीक वैसे ही यह दो शब्द से मैं अपने आप को पहचान ने की कोशिश करती हूं। मैं करीब पिछले नौ साल से अपने छोटे से शहर को छोड़ दूसरे राज्यों में घूमती रही हूं और पिछले चार साल से दिल्ली में रह रही हूं। तो पिछले दो साल में कब मेरे अंदर यह मैं घुस गया यह मुझे खुद पता ही नहीं चला।
अब मुझे मैं बोलना अच्छा लगता है इस से मुझ में आत्मविश्वास की भावना पैदा होती है अपनी बात को जब मजबूती से रखना हो तो मैं खुद को मैं शब्द से ही अभिव्यक्त करना पसंद करती हूं। मैं शब्द में स्पष्टता दिखती है और स्वार्थी होने का गुण भी झलकता है। स्वार्थी व्यक्ति जैसे सिर्फ खुद के विषय में सोचता है वैसे ही मैं मतलब सिर्फ मैं और कोई नहीं अंदर बाहर कोई नहीं अकेला निर्विकार खड़ा व्यक्ति।
तो बात यहां से उठी कि मैं अपने शहर जमशेदपुर आयी हुई हूं और मेरी आठ साल की बेटी श्रुति ने मुझ से यह कह दिया है कि मैं यहां आकर यहां कि भाषा में ही बोलूंगी मतलब वह खुद को हम कह कर पुकारती है। और उसके हम शब्द के उच्चारण में सारे अपनत्व के साथ साथ पूरा आत्मविश्वास भी दिखता है। बहुत मजबूती से वह खुद को अभिव्यक्त करने के लिए हम का उच्चारण करती है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. लिखा ठीक है आपने "मैं" "हम" का उपयोग।
    काल पात्र को देखकर इसका उचित प्रयोग।।

    साथ ही-

    मैं भी टाटा से यहाँ लिखता हूँ कुछ रोज।
    इस नगरी के लोग का करता हूँ नित खोज।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. हमें तो मै से ज्यादा अच्छा हम ही लगता ही. लेकिन कभी कभी मैं का प्रयोग भी अवांछनीय हो जाता है.. .

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  3. मैं शब्द में स्पष्टता तो दिखती है .. पर क्‍या सचमुच स्वार्थी होने का गुण भी झलकता है ?

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  4. jab se mai aur tum ham na rahe dosti me vo dam na rahe mujhe bhi lagta hai ham me adhik apnepan aur atamvishvas ka bhav hai mai me darp jhalkta hai

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  5. दिल्ली जैसे शहरों में एकवचन की जगह बहुवचन का प्रयोग चुटकुले जैसा लगता है.

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